सगोत्र विवाह किसी भी परिस्थितिमें है हानिकारक !


एक तथाकथित सद्गुरु अपने शंका समाधान सत्रमें सगोत्र विवाह क्यों नहीं करने चाहिए ?, इस सम्बन्धमें एक जिज्ञासुद्वारा पूछे गए प्रश्नके उत्तरमें कह रहे थे कि यदि आप महानगरमें रहने लगे हैं और आपको गोत्र इत्यादि ज्ञात नहीं है या उसे मानते नहीं हैं या वर्णसंकरके कारण जानते नहीं हैं या आप अपने गांव नहीं जाते हैं, तो सगोत्र विवाह कर सकते हैं ! सगोत्र अर्थात एक ही गोत्रमें विवाह करना किसी भी परिस्थतिमें अनुचित है, यह तो आज विज्ञानने भी सिद्ध कर दिया है, एक ही गोत्र या कुलमें विवाह होनेपर दंपत्तिकी संतानें आनुवंशिक दोषोंके साथ उत्पन्न होती हैं, अर्थात मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं । शास्त्रोंके अनुसार, इन्हीं कारणोंसे सगोत्र विवाहपर प्रतिबंध लगाया गया था । ऐसेमें ऐसे अनुचित मार्गदर्शन देनेवालेको सद्गुरु कैसे कह सकते हैं ?, यह समझमें नहीं आता है ! यदि आपको गणित नहीं आती है या गणितके सिद्धांत नहीं ज्ञात हैं तो क्या उसके सिद्धांत आपपर लागू नहीं होंगे ? आइए, गोत्रके सम्बन्धमें कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जान लें –

पाणिनीकी अष्टाध्यायीमें गोत्रकी एक परिभाषा इस प्रकार है – ‘अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्’, अर्थात ‘गोत्र’ शब्दका अर्थ है, पुत्रके पुत्रके साथ आरम्भ होनेवाली (एक साधुकी) संतान । इस प्रकारसे प्राचीन कालसे एक ही गोत्रके भीतर होनेवाले लडका और लडकीका एक-दूसरेसे भाई-बहनका सम्बन्ध माना जाता है; क्योंकि उनके पूर्वज एक ही हैं; इसलिए वे सगे तो नहीं; किन्तु मूल रूपसे भाई-बहन ही हुए। इसलिए गोत्र सिद्धांतके अंतर्गत एक ही गोत्रके युवक एवं युवतीका विवाह करनेकी मनाही होती है ।

गोत्र शब्दका अर्थ होता है, वंश या कुल (lineage) । गोत्र प्रणालीका मुख्य उद्देश्य किसी व्यक्तिको उसके मूल प्राचीनतम व्यक्तिसे जोडना है, उदाहरणके रूपमें यदि कोई व्यक्ति कहे कि उसका गोत्र वशिष्ठ है तो इसका अभिप्राय यह है कि उसकी वंश परम्परा वैदिक ऋषि वशिष्ठसे प्रारंभ हुई है या ऐसा समझ सकते हैं कि वह व्यक्ति ऋषि वशिष्ठकी वंश परम्परामें जन्मा है ।

यदि नामावली की जाए तो प्रचलित गोत्रके ये आठ ऋषि इस प्रकार हैं – अंगिरस, अत्रि, गौतम, कश्यप, भृगु, वशिष्ठ, कुत्स एवं भारद्वाज ऋषि । इन आठ ऋषियोंको ‘गोत्रकरिन’ भी कहा जाता है । (इन आठ ऋषियोंके नामोंमें भिन्न धर्मशास्त्रोंमें पाठभेद हैं ।)

प्राचीन कालसे ही वैदिक विवाहमें गोत्र-प्रवरका अत्यधिक महत्त्व रहा है । पुराणों व स्मृति ग्रंथोंमें बताया गया है कि यदि कोई कन्या संगोत्र हो; किंतु सप्रवर न हो अथवा सप्रवर हो; किंतु संगोत्र न हो, तो ऐसी कन्याके विवाहको अनुमति नहीं दी जानी चाहिए ।

वैदिक हिन्दू धर्ममें ऋषियोंकी संख्या लाखोंमें होनेके कारण गोत्रोंकी संख्या भी लाखोंमें मानी जाती है, परंतु सामान्यतः आठ ऋषियोंके नामपर मूल आठ गोत्र ऋषि माने जाते हैं; किन्तु  कालांतरमें उनके वंशके अन्य विशिष्ट पुरुषोंके नामपर अन्य गोत्र भी उत्पन्न हुए हैं।

विवाह निश्चित करते समय गोत्रके साथ-साथ प्रवरका भी ध्यान रखना आवश्यक होता है । प्रवर भी प्राचीन ऋषियोंके नाम हैं; परन्तु अंतर यह है कि गोत्रका संबंध रक्तसे अर्थात शारीरिक होता है, जबकि प्रवरका सम्बन्ध आध्यात्मिक होता है अर्थात मूल पुरुषके पश्चात उस कुलमें कितने महान ऋषि हुए ?! जैसे-गर्ग गोत्रवाले पांच प्रवर हुए, अर्थात गर्ग गोत्रमें गर्ग ऋषिके पश्चात पांच महान ऋषि हुए – आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, श्येन और गार्ग्य |

वर-वधूका गोत्र और प्रवर भिन्न-भिन्न होना आवश्यक है । मत्स्यपुराणमें ब्राह्मणके साथ संगोत्रीय (एक ही गोत्र) शतरूपाके विवाहपर आश्चर्य और क्षोभ प्रकट किया गया है। गौतमधर्म सूत्रमें भी असमान प्रवरवाले विवाहका निर्देश दिया गया है । आपस्तम्ब धर्मसूत्र कहता है- ‘संगौत्राय दुहितरेव प्रयच्छेत्’ (समान गोत्रके पुरुषको कन्या नहीं देनी चाहिए)। असमान गोत्रीयके साथ विवाह न करनेपर पुरुषके ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाने तथा चांडाल पुत्र-पुत्रीके उत्पन्न होनेकी बात कही गई है । विभिन्न सम्प्रदायोंमें गोत्रकी संख्या भिन्न-भिन्न है । प्राय: तीन गोत्रोंको छोडकर ही विवाह किया जाता है, एक स्वयंका गोत्र, दूसरा माताका गोत्र (अर्थात मांने जिस कुल या गोत्रमें जन्म लिया हो) और तीसरा दादीका गोत्र । कहीं कहीं नानीके गोत्रको भी माना जाता है और उस गोत्रमें भी विवाह नहीं होता ।

स्त्री-पुरुष जितने अधिक कुलोंकी दूरीपर विवाह करते हैं उनकी संतानें उतनी ही अधिक प्रतिभाशाली और गुणी होती हैं ।



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