भिन्न माध्यमोंद्वारा मेरे स्वास्थयके लिए क्या आवश्यक है, उसे भी उपलब्ध करवाकर देना


सगुण गुरुके निर्गुण निराले माध्यम
सूक्ष्म आसुरी शक्तियोंके सतत आक्रमणके कारण वर्ष २००६  से ही प्राणशक्ति ४०  से  ५० % के मध्य रहने लगी थी जिस कारण स्वास्थ्यपर विपरीत प्रभाव पडने लगा | ख्रिस्ताब्द  २०१० से स्वतन्त्र रूपसे ईश्वर आज्ञा अनुरूप ‘उपासना’नामक संस्थाके माध्यमसे धर्मप्रसार आरंभ करनेपर अपनी  शारीरिक क्षमतासे अधिक सेवा करनेके कारण, पर्याप्त नींद न लेनेके कारण एवं सतत सूक्ष्म शक्तियोंद्वारा समष्टि स्तरके आक्रमणके कारण, शरीरके सूजनमें अकस्मात वृद्धि हुई है तथा अल्प प्राणशक्तिके कारण न अधिक चल पाती हूं और न ही अधिक कोई शारीरिक श्रमवाला कार्य या व्यायाम ही अधिक प्रमाणमें कर पाती हूं | कभी-कभी  कुछ साधकोंको मेरे स्वास्थ्यकी स्थिति देखकर अत्यधिक चिंता भी होती है, उन्हें लगता है कि कहीं मुझे कोई शारीरिक कष्ट या रोगके कारण तो ऐसा नहीं हो रहा है; अतः उनकी संतुष्टि हेतु मैं पिछले पांच वर्षोंसे अपने सम्पूर्ण स्वास्थ्यकी वार्षिक जांच करवा लेती हूं | परंतु प्रत्येक बार चिकित्सक(डॉक्टर) ने कहा कि मैं पूर्णत: स्वस्थ हूं, वैसे यह तो मुझे ज्ञात ही होता है; परंतु साधकोंको भी भान हो जाये कि मेरी शारीरिक अस्वस्थता आध्यात्मिक कारणोंसे है; अतः मैं नियमित जांच करवा लेती हूं |
ख्रिस्ताब २०१२ में सब जांचके पश्चात जब मैं अपना जांचका ब्यौरा(रिपोर्ट) लेकर चिकित्सकके पास पहुंची तो उन्होंने कहा कि आप पूर्णत: स्वस्थ है, मात्र आपका वजन थोडा अधिक है और आपमें अच्छे कोलेस्टरोलकी आंशिक कमी है इस हेतु आप बादाम एवं अखरोट खाया करें | वजन अधिक है, यह तो मुझे भी ज्ञात है;  परंतु उन्हें यह कैसे बताएं कि उसके कारण क्या हैं | और पिछले चार वर्षोसे भिन्न नगरोंमें भिन्न चिकित्सालयोंमें मैंने जांच करवाए हैं सभी चिकित्सक मात्र यही कहते हैं कि आप स्वस्थ हैं. मात्र थोडा बादाम और अखरोट खाया करें और थोडा अधिक विश्राम करें !
सितम्बर २०१२ में जब चिकित्सकने मुझे प्रथम बार सूखा मेवा ग्रहण करनेका सुझाव दिया तो चिकित्सालयसे बाहर निकल कर, मैं मन ही मन सोचने लगी कि धर्मकार्य करने हेतु जो आवश्यक धन मिलता है, वह भी पर्याप्त नहीं पडता है, ऐसेमें मैं बादाम और अखरोट कैसे ग्रहण कर सकती हूं, वैसे भी समाज, मुझे ये पैसे धर्मकार्य हेतु पूर्ण विश्वाससे देता है; परंतु उस दिवससे न जाने कैसे, साधक या जिज्ञासु जो भी मुझसे मिलने आते हैं उनमें से कोई न कोई स्वतः ही बादाम या अखरोट लेकर आते हैं या मैं कहीं जाती हूं तो वे मुझे उपहारके रूपमें मुझे बादाम या अखरोट दे देते हैं और मुझे इन्हें क्रय कर ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं पडती है , इतना ही नहीं कभी-कभी तो वह इतना अधिक हो जाता है कि मैं साधकोंको उन्हें भेंट कर देती हूं, जबकि जो भी मुझे ये मेवा भेंट स्वरुप देते हैं उन्हें यह तथ्य ज्ञात नहीं होता | इससे समझमें आता है कि हमारे श्रीगुरु सूक्ष्मसे हमारा कितना ध्यान रखते हैं ! मैं बादाम और अखरोट ग्रहण भी करूं और मुझे संस्थाके धनका व्यय न करना पडे, इन दोनोंका तथ्योंका ध्यान, वे अपने भिन्न निर्गुण माध्यमोंसे रखते हैं ऐसे श्रीगुरुकी महिमाका शब्दोंमें कैसे वर्णन करूं, यह समझ नहीं आता है | – तनुजा ठाकुर

 

 



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