सगुण निर्गुण नहीं भेदाभेद !


totapuri_maharaj

एक बार तोतापुरी महाराज स्वामी विवेकानंदके गुरु रामकृष्ण परमहंससे मिलने दक्षिणेश्वर मन्दिर पधारे । स्वामीजी उन्हें गुरु मानते थे । तोतापुरी महाराजका नियम था कि वे तीन दिनसे अधिक कहीं नहीं रुकते थे; किंतु रामकृष्ण परमहंसजीकी विलक्षणताने उन्हें अधिक समय तक रुकनेके लिए विवश कर दिया । स्वामीजीकी प्रतिभासे प्रभावित तोतापुरीजी महाराज दक्षिणेश्वरमें पूरे ग्यारह माह तक रहे । इस मध्य उन्होंने परमहंसजीसे कहा, ‘यदि तुम ऐसे न होते तो मैं तुम्हारे पास इतने दिनोंतक नहीं ठहरता ।’ इस अवधिमें दोनोंके मध्य विस्तृत ज्ञानपरक व आध्यात्मिक चर्चाएं हुई । एक दिन गुरु और शिष्यमें सगुण-निर्गुणके विषयमें वार्तालाप हुआ । तोतापुरीजी ईश्वरके निर्गुण सत्तामें विश्वास रखते थे और रामकृष्ण परमहंस ईश्वरके सगुण रूपके मां कालीके उपासक थे । दोनोंने अपने-अपने तर्क रखे; किंतु कोई किसीसे सहमत नहीं हो पाया । इसी मध्य एक दिन तोतापुरीजीको इतना अधिक शारीरिक कष्ट हुआ कि उनका मन निर्विकल्प समाधिमें न लग पाया और वे गंगामें डूबने हेतु तत्पर हो गए । गंगाकी ओर चलते-चलते उन्हें डूबनेके लिए कहीं गहरा जल नहीं मिला । वे विस्मित थे कि क्या गंगाका सारा जल सूख गया है ? तभी उन्होंने देखा मां सामने खडी हैं और उन्हें अभय दे रही हैं । मांकी कृपा दृष्टिसे इस दिव्य अनुभवने उनके कष्टको हर लिया और निर्गुण-सगुणमें अभेद स्थापित कर दिया । वे दक्षिणेश्वर लौटे और अपने शिष्यको ‘परमहंस’की उपाधि देते हुए स्वीकार किया कि उनका ज्ञान पहले अपूर्ण था और अब पूर्ण हुआ है । वस्तुत: निर्गुण ब्रह्म और सगुण शक्तिमें भेद नहीं है, एक ही तत्त्वके दो पक्ष हैं । अंतर देखनेवालेकी दृष्टिका है, अन्यथा अनुभूतिके स्तरपर दोनों समान हैं ।

ध्यान रहे, प्रायः गुरु समष्टिको शिक्षा एवं संदेश देने हेतु इस प्रकारकी लीलाएं करते रहते हैं । चूंकि संतोंमें अहं नहीं होता; अतः वे ऐसे प्रसंगोंको सहज होकर बताते हैं ।



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution