धर्मधारा


जिस कश्मीरमें सेनाके सैनिक या पुलिसकर्मीको अकेले देखते ही आतंकी एवं स्थानीय लोग उन्हें मारनेको झपटते हैं, उस स्थानपर आतंकियोंके विरुद्ध कार्यवाहीको ‘रमजानका माह है’, यह कहकर रोकना, इससे इस देशके सुरक्षाकर्मियोंके मनोबलका कितना क्षरण हुआ होगा, इसकी कल्पना करना भी कठिन है ! और उसके ऊपरसे गृहमन्त्रीद्वारा पथराव करनेवालोंको क्षमादान देनेकी बात कहना, यह तो इस देशके राज्यकर्ताओंकी सैनिकोंके प्रति सरासर संवेदनाशून्यता दर्शाता है और उनमें इस देशके रक्षकोंके प्रति जो उत्तरदायित्व होना चाहिए, वह नहीं है, यह बताता है । कुछ समय पूर्व समाचार प्रकाशित हुआ था कि सेनामें अनेक पद रिक्त हैं । जहांके शासक, अपने प्राणोंको हथेलीपर रखकर इस देशकी जनताकी रक्षा करने या सहायता करने हेतु तत्पर रहनेवालों सुरक्षाकर्मियों या सैनिकोंका विचार नहीं करते, उनके राज्यमें यदि कलको कोई सेनामें भर्ती ही नहीं होना चाहे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए !
पूर्वकालके राज्यकर्ता युद्ध क्षेत्रमें जाकर राष्ट्रके प्रति अपने उत्तरदायित्वका निर्वाह करते थे, अपने सैनिकोंका मनोबल बढाते थे और इससे अपना राष्ट्रप्रेम व्यक्त करते थे, कई राज्यकर्ता इसी क्रममें हुतात्मा भी हुए हैं । आजके राज्यकर्ता, राष्ट्रके रक्षकोंके प्रति भी अपने नैतिक उत्तरदायित्वतकका निर्वाह नहीं कर पाते हैं, जो संवेदना ऐसे विपरीत परिस्थितिमें कार्य करनेवाले रक्षकोंके प्रति होनी चाहिए, वह भी इनमें नहीं है तो ऐसे स्वार्थी राज्यकर्ताओंके विरुद्ध यदि कलको सेना विद्रोह कर दे तो कृपया आश्चर्य न करें; क्योंकि धैर्यकी भी एक सीमा होती है, वह टूटनेपर मन विद्रोही हो जाता है !



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