सकाम और निष्काम साधना


साधनाके प्रकार
अ. सकाम साधना
आ. निष्काम साधना
सकाम साधना अर्थात् माया या संसारकी किसी भी वस्तुकी इच्छा रख साधना करना और निष्काम साधनाका अर्थ है, मात्र ईश्वरीयकृपा, गुरुकृपा, आनन्द या शान्ति हेतु अर्थात् आध्यात्मिक प्रगतिके लिए साधना करना । वैसे तो निष्काम साधनाको सन्तोंने और धर्म शास्त्रोंने श्रेष्ठ प्रकारकी साधना कहा है; किन्तु एक सामान्य साधक, सकाम साधनासे ही निष्काम साधनाकी ओर बढता है; अतः आध्यात्मिक यात्रामें सकाम साधनाका भी अपना महत्त्व है । उदाहरणके रूपमें यदि कोई व्यक्ति कुछ भी साधना नहीं करता और उसके जीवनमें कोई ऐसा कष्ट है जिसका निराकरण वह अत्यधिक प्रयास कर भी कर नहीं कर पाता है, ऐसेमें यदि वह किसी मन्दिरमें या किसी तीर्थक्षेत्र अथवा किसी सन्त या गुरुके आश्रममें जाता है और वहांसे उसकी साधना आरम्भ होती है तथा इसी क्रममें उसकी मांगी हुई इच्छा पूर्ण हो जाती है तो इससे, उस साधकको, उस इष्टके प्रति विश्वास निर्माण हो जाता है और वह उसकी आराधना और भी श्रद्धापूर्वक करने लगता है । साधनाकी वृद्धि होनेपर उसे और भी अनुभूतियां होती हैं, इससे उसका विश्वास श्रद्धामें परिवर्तित हो जाता है ! धीरे-धीरे वह अपने आराध्यसे निष्काम भावसे प्रेम करने लगता है; किन्तु इस क्रममें अनेक वर्ष या अनेक जन्म भी लग सकते हैं; अतः सकाम और निष्काम साधनाका महत्त्व जानना अति आवश्यक है !
साधनाका महत्त्व यह है कि चाहे वह सकाम की जाए या निष्काम, दोनों ही स्थितिमें वह हितकारी होती है ! मात्र यदि साधना किसी सांसारिक वस्तुके लिए की जाती है तो उससे साधनासे जो शक्ति संग्रहित होती है वह उस इच्छाकी पूर्तिमें व्यय हो जाती है; फलस्वरूप आध्यात्मिक प्रगति या तो नहीं होती या बहुत ही धीमी गतिसे होती है ! वहीं यदि कोई निष्काम भक्ति करता है तो उसे ईश्वरीय कृपा तो प्राप्त होती ही है, साथ ही उसकी जो भी आवश्यकताएं हैं, उनकी भी पूर्ति ईश्वर करते ही   हैं । भगवान श्रीकृष्णने गीतामें कहा है –
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां
 योगक्षेमं वहाम्यहम् 
इसका अर्थ है – अनन्यचित्तसे जो भी भक्त मेरी उपासना करते हैं, उन निष्काम चिन्तन करनेवाले लोगोंके योगक्षेमका मैं स्वयं वहन करता हूं ।
इसे एक उदाहरणसे समझ लेते हैं, जैसे एक मां कुछ वस्तुएं (सामान) क्रय करने हेतु बाहर जा रही है, उनकी दो पुत्रियां हैं, वे दोनोंसे पूछती हैं कि उन्हें विपणी (बाजार) से कुछ चाहिए क्या ? ज्येष्ठ पुत्री मांसे कहती है ‘उसे समोसा चाहिए, साथ ही उसे कुछ वस्त्र इत्यादि भी चाहिए और छोटी पुत्री सन्तोषी प्रवृत्तिकी होनेके कारण वह मांसे कुछ भी लानेको नहीं कहती है, ऐसेमें जब वह मां विपणि (बाज़ार) जाएगी तो वह सर्वप्रथम किस पुत्रीके विषयमें सोचेगी, आप स्वयं सोचें ! निश्चित ही वह मां ज्येष्ठ पुत्रीने जो मांगा है उसके लिए यथासम्भव उसकी मांग पूरी करेगी ही; किन्तु छोटी पुत्रीको क्या चाहिए, इस विषयमें वह स्वयं सोचेगी और उसके लिए जो भी उसकी प्रिय एवं आवश्यक वस्तु है वह अवश्य लेकर जाएगी ! इसी प्रकार ईश्वर भी हमारे साथ करते हैं जब हम भगवानसे कुछ मांगते हैं तो वे हमें अवश्य दते हैं; किन्तु जो भक्त मात्र भगवानसे ईश्वरीय कृपा हेतु प्रार्थना करता है, ईश्वर उसकी सभी आवश्यकताओंकी पूर्ति करते हैं; इसलिए भगवानसे हमें क्या मांगना चाहिए यह जानना अति आवश्यक है ! जब भी भगवानसे प्रार्थना करते हैं तो यह कहना चाहिए “हे प्रभु ! मुझे दुःख सहनेकी शक्ति दें और प्रत्येक परिस्थितिमें मैं साधना कर सकूं ऐसी आप कृपा करें !” अब प्रश्न यह उठता है कि भवगानसे दुःख दूर करनेकी अपेक्षा दुःख सहन करनेकी शक्ति क्यों मांगनी चाहिए ?  यदि हम भगवानसे दुःख दूर करने हेतु प्रार्थना करते हैं तो वह दुःख दूर नहीं होता अगले जन्मोंमें भोगने हेतु टल जाता है ! यह सृष्टि कर्मफलके सिद्धान्तपर चलती है और प्रत्येक व्यक्तिको अपने प्रारब्ध और संचितके कर्मफल, जो सुख और दुःखके रूपमें होते हैं उसे भोगने ही पडते हैं ऐसेमें अपने दुःखको भोग लेना ही बुद्धिमानी है अन्यथा वह जितना अगले-अगले जन्मोंके लिए टलेगा, ब्याज समान ही बढता जाएगा, ऐसेमें कष्टोंकी तीव्रता भी उतनी ही बढती जाएगी; इसलिए साधना, निष्काम करना उत्तम होता है और अपने प्रारब्धको भोगनेकी शक्ति मांगनेसे ईश्वरकी कृपा भी मिलती है, जिससे हमें दुःखकी तीव्रताका भान नहीं होता और साधना व्यय न होनेके कारण आध्यात्मिक प्रगति भी होती है !

विशेष बात यह है ख्रिस्ताब्द २०२३ से आरम्भ होनेवाले हिन्दू राष्ट्रसे पूर्व होनेवाला महाविनाश रुपी आपातकाल आरम्भ हो गया है; अतः सकाम साधना कर अपनी साधनाको व्यय न करें, अपितु निष्काम साधना कर अपनी भक्तिको बढाएं ! भगवान् श्रीकृष्णने कहा है, ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’ अर्थात् मेरे भक्तोंका कभी नाश नहीं होता और भक्त वह होता है जो एक क्षणके लिए विभक्त नहीं होते ! अतः भक्त बनें !
भक्ति बढाने हेतु व्यष्टि स्तरपर अखण्ड नामजप करें एवं समष्टि स्तरपर राष्ट्र और धर्मके कार्यमें यथाशक्ति योगदान दें इससे आपकी साधना द्रुत गतिसे बढेगी ! आज चारों और धर्म ग्लानि हो रही है, देवी-देवताओंकी चलचित्रोंमें, वृत्तपत्र, धारावाहिकोंमें विडम्बनाएं हो रही हैं, उसे रोकने हेतु यथाशक्ति प्रयास करें ! जहां भी अधर्म दिखाई दे उसका व्यष्टि स्तरपर एवं संगठित होकर विरोध करें ! इससे धर्मरक्षण होगा और आपपर ईश्वरीय कृपाका संचार होगा ! – तनुजा ठाकुर



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