समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग -१)


हमारे श्रीगुरुके अनुसार कलियुगमें व्यष्टि साधनाका ३० % एवं समष्टि साधनाका महत्त्व ७० % है और कलियुगके अन्तिम चरणतक रहेगा !; इसलिए हम यह नूतन लघु लेख श्रृंखला इस सम्बन्धमें आरम्भ कर रहे हैं ।

१. कलियुगमें समष्टि साधनाका इतना अधिक महत्त्व क्यों ? (भाग – १)

पूर्वके कालमें लोगोंकी वृत्ति सात्त्विक होनेके कारण उनके सर्व कृत्य सात्त्विक होते थे और उन्हें जब भी धर्म सम्बन्धी कुछ आचार या शास्त्र बताया जाता था तो वे उसे बिना तर्क किए, गुरु या धर्मशास्त्रोंपर विश्वास कर किया करते थे, जैसे पुरुषोंने धोती या स्त्रियोंने साडी क्यों पहननी चाहिए ?, पूजामें अखण्ड चावलका उपयोग क्यों करना चाहिए ?, मृत्युके समय या उसके पश्चात मृत शरीरके मुखमें गंगा जल और तुलसी दल क्यों डालते हैं जैसे प्रश्नोंके कारणके विषयमें पूर्व कालमें लोगोंके मनमें संशय नहीं उठता था किन्तु कलियुगमें लोगोंकी सात्त्विक बुद्धि न होनेके कारण उनके मनमें संशय निर्माण होता है और वे इसका उत्तर चाहते हैं, हमारे वैदिक धर्ममें कुछ भी बिना कारण तो करने हेतु बताया नहीं गया था; इसका आध्यात्मशास्त्रीय आधार है ही । कलियुगमें समाजको हिन्दू धर्मके आध्यात्मशास्त्रीय कारण ज्ञात हो एवं समाज सदैव धर्माभिमुख रहे, इस हेतु समष्टि साधनाका अत्यधिक महत्त्व रहेगा ! (क्रमश:)



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