समष्टि साधना सम्बन्धी दृष्टिकोण (भाग – २)


हमारे श्रीगुरुके अनुसार कलियुगमें व्यष्टि साधनाका ३० % एवं समष्टि साधनाका महत्त्व ७० % है और कलियुगके अन्तिम चरणतक रहेगा ।
कलियुगमें समष्टि साधनाका इतना अधिक महत्त्व क्यों ? (भाग – २)
कलियुगके आरम्भ होनेके पश्चात अनेक अवैदिक या अहिन्दू धर्मोंका (मानव निर्मित या स्थापित होनेके कारण वस्तुतः ये पन्थ हैं) जन्म हुआ । इन सभी पन्थोंका एक ही उद्देश्य है, हिन्दू धर्मका नाश करना, उसके अस्तित्वको ही मिटा देना ! ये सभी पन्थ या तो हिन्दू देवी-देवताओंके अस्तित्वको नहीं मानते हैं या वेदोंको नहीं मानते हैं और इनका अध्यात्म स्वर्ग और नरक तक ही सीमित होता है । सतही स्तरके अध्यात्मका प्रतिपादन करनेवाले ये धर्म मृत्यु उपरान्तकी यात्रा या पुनर्जन्मको भी नहीं मानते हैं !
ये येन-केन-प्रकारेण हिन्दुओंको अपने तथाकथित धर्म या पन्थमें सम्मिलित करने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं ! कलियुगी मनुष्योंमें लोभ और तमोगुण प्रबल होनेके कारण वे ऐसे पन्थोंके मायाजालमें त्वरित आकर्षित हो जाते हैं । और इस कारण यदि हिन्दुओंको धर्मकी शिक्षा न दी जाए तो ऐसे पन्थोंके अनुयायियोंकी संख्या अत्यन्त बढ जाती है, जो आप देख ही रहे हैं ।
हिन्दुओंको अहिन्दू बनाकर सर्वत्र असुरत्वका प्रसार कर, मानवताका नाश करना ही इनका मुख्य हेतु होता है तो स्वाभाविक है कि ये पैशाचिक स्वरुपकी पद्धतियोंका प्रसार करनेमें लगे रहते हैं और इनका विभत्स स्वरुप अब सबके समक्ष प्रकट भी होने लगा है । इन पन्थोंसे मानवका रक्षण करने हेतु एवं वैदिक सनातन धर्मके स्वरुपको जीवित रखने हेतु  कलियुगमें समष्टि साधनाका सदैव ही महत्त्व रहेगा ! – तनुजा ठाकुर



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