समय रहते अपने मूल स्थानसे जुड जाएं !


      धर्मप्रसारके मध्य मेरा सुदूर पहाडी क्षेत्रोंमें भी जाना हुआ है और मैंने पाया कि वहांका जीवन समतल  क्षेत्रोंमें (नदियोंके तटीय क्षेत्रोंमें) रहनेवालेकी अपेक्षा अधिक चुनौतीपूर्ण एवं कठिन होता है; किन्तु वे अपने कठोर परिश्रम, धर्मपालन एवं साधनासे वहां भी आनन्दी रहते हैं; किन्तु जब ये लोग महानगरोंमें आ जाते हैं तो वे अपने मूल संस्कारको त्याग देते हैं । मैंने पाया है कि वे मात्र दो या तीन पीढी यदि महानगरमें रह जाएं तो ये अपने संस्कारोंको ही नहीं भूल जाते हैं; अपितु अपने कुलाचार, कुलदेवी इत्यादि सबका विस्मरण कर स्वयंको उस महानगरका निवासी बताने लगते हैं । इसमें वैसे तो कोई समस्या नहीं है; किन्तु इनके इस आधुनिक आचरणसे इनके कुलदेवता और पितर दोनों रुष्ट हो जाते हैं और इन्हें भी ऐसे कष्टके कारण अनेक समस्याएं होने लगती हैं । ऐसे प्रकरण मैंने देहली और मुंबईमें बहुत अधिक देखे हैं । ऐसे ही किसी पहाडी व्यक्तिने कहा कि अब तो पहाडोंमें गांवके गांव रिक्त हो चुके हैं मात्र कुछ वृद्ध लोग वहां एकाकी रहते हैं तो ऐसे सभी लोगोंसे मैं एक अनुरोध करना चाहूंगी कि समय रहते अपने मूल स्थानसे जुड जाएं ! वहां एक कच्चा-पक्का घर बना लें; क्योंकि आनेवाले कालमें महानगरोंमें रहना बहुत कठिन हो जाएगा । जैसे आज आप देख रहे हैं कि महानगरोंसे श्रमिक सहस्रों किलोमीटर पैदल चलकर अपने मूल ग्राम लौट रहे हैं, वैसे ही आनेवाले कालमें मध्यम वर्गको भी ऐसा ही करना पडेगा; इसलिए अभीसे चेत जाएं और अपने मूल ग्राममें कुछ सामान्य सुविधाएं करके रखें !


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