देववाणी संस्कृत एक पूर्ण भाषा !


संस्कृत देवभाषा है । यह सभी भाषाओंकी जननी है । विश्वकी समस्त भाषाएं इसीके गर्भसे उद्भूत हुई हैं। वेदोंकी रचना इसी भाषामें होनेके कारण इसे वैदिक भाषा भी कहते हैं । संस्कृत भाषाका प्रथम काव्य-ग्रन्थ ऋग्वेदको माना जाता है । ऋग्वेदको आदिग्रन्थ भी कहा जाता है । किसी भी भाषाके उद्भवके पश्चात इतनी दिव्य एवं अलौकिक कृतिका सृजन कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता है । ऋग्वेदकी ऋचाओंमें संस्कृत भाषाका लालित्य, व्याकरण, छन्द, सौन्दर्य एवं अलंकार अद्भुत एवं आश्चर्यजनक हैं । दिव्य ज्ञानका यह विश्वकोश संस्कृतकी समृद्धिका परिणाम है । यह भाषा अपनी दिव्य एवं दैवीय विशेषताओंके कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवन्त है ।

  संस्कृतका तात्पर्य परिष्कृत, परिमार्जित, पूर्ण एवं अलंकृत भाषासे है । यह भाषा इन सभी विशेषताओंसे पूर्ण है । यह भाषा अति परिष्कृत एवं परिमार्जित है । इस भाषामें भाषागत त्रुटियां नहीं मिलती हैं, जबकि अन्य भाषाओंके साथ ऐसा नहीं है । यह परिष्कृत होनेके साथ-साथ अलंकृत भी है । अलंकार इसका सौन्दर्य है । अतः संस्कृतको पूर्ण भाषाका स्थान दिया गया है ।



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