साधारण मनुष्य स्वेच्छासे सर्व कृति करता है ! उसके लिए उसकी इच्छा प्रधान होती है !
साधक स्वेच्छाकी अपेक्षा परेच्छासे सर्व कृतिको करनेका प्रयास करता है, इससे मनोलय और अहं लय आरंभ हो जाता है |
संत मात्र ईश्वरेच्छासे सर्व कृति करते हैं; अतः कुछ अहंकारियोंको उनकी(संतोंकी) कृति समझमें नहीं आती है और वे संतोंको जिनका अहंकार शून्यकी ओर जा रहा होता है, उसे ही अहंकारी संबोधित कर देते हैं ! – तनुजा ठाकुर
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