सन्त वाणी


जो फलको जाने बिना ही कर्मकी ओर दौडता है, वह फल-प्राप्तिके अवसरपर केवल शोकका भागी होता है- जैसे कि पलाशको सींचनेवाला पुरुष उसका फल न खानेपर खिन्न होता है । – महर्षि वाल्मीकि


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