सन्त वाणी


ज्ञाताज्ञात पाप ही अंत:करणकी मलिनता है । जब तक अंत:करण मलरहित, पापरहित नहीं होगा, तब तक वास्तविक दृष्टिका उदय नहीं होगा । – आदिगुरु शंकराचार्य



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