ख्रिस्ताब्द २०१४ में एक स्वामीजीसे हम कुछ साधकों की भेंट हुई , जैसे ही उन्हें पता चला कि हम साधकोंमें से एक साधक उनके प्रांत और उनके जातिके हैं, उनका प्रेम उस साधकके प्रति उमड पडा, जब भी उन्हें कुछ भी चाहिए होता था वे उसी साधकका नाम बुलाते थे ! हम सभी साधक स्वामीजीकी उस प्रांतवाद और जातिवादको देख हतप्रभ थे ! सन्त वे होते हैं जो सभी ‘वाद’से ऊपर उठ चुके होते हैं ! ईश्वरको सर्व जीव प्रिय होते है; अतः ईश्वरसे एकरूप होने हेतु समदृष्टि रख सबपर समान रूपसे वर्तन करनेको संतत्व कहते हैं ! -तनुजा ठाकुर
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