अनके बार जब किसी सन्तका देह त्याग होता है तो समाचारपत्रमें जो वृत्त प्रकशित होते हैं, उसमें निधन या मृत्यु शब्दका प्रयोग होता है । सन्तोंका निधन या मृत्यु नहीं होती है, उनका देह त्याग होता है । ऐसा क्यों ?, इस समझने हेतु अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण समझ लें, विशेषकर इस तथ्यको सभी पत्रकार बन्धु अवश्य पढकर, समझ लें !
सन्तों एवं सामान्य मनुष्यमें यह भेद होता है कि एक सामान्य मनुष्य मृत्युके नियन्त्रणमें होता है एवं मृत्यु, सन्तोंके नियन्त्रण होती है; इसलिए आपने पढा होगा कि अनेक सन्तोंने अपने भक्तोंको अकाल मृत्युके प्रकोपसे बचाकर उन्हें जीवन दान दिया तथा स्वयंके देह त्यागकी भी पूर्वसूचना वे अपने भक्तोंको दे देते हैं ।
सन्त अपनी इच्छा अनुसार देहत्याग करते हैं; इसलिए जहां सामान्य व्यक्तिकी देहको मृत्यु उपरान्त अग्नि संस्कारकेद्वारा पञ्चतत्त्वमें विलीन किया जाता है, वहीं सन्तोंके देहको या तो उनकी इच्छा अनुसार जलमें या भूमिमें या अग्निमें समर्पित किया जाता है । सन्तोंकी देहको या उनकी अस्थियोंको जहां रखते हैं, उस स्थानको ‘समाधि’की उपमा दी जाती है । सन्तोंका देह चैतन्यकी स्रोत होता है; अतः उनकी समाधिसे उनके आध्यात्मिक स्तर अनुरूप चैतन्यके स्रोत, शक्ति, आनन्द या शान्तिके स्पन्दनोंके रूपमें प्रस्फुटित होते रहते हैं; इसलिए आज भी हम कुछ प्राचीन सन्तोंकी समाधिपर दर्शन एवं नमस्कार करने हेतु जाते हैं ।
सामान्य व्यक्तिके प्राण पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंमेंसे (नेत्र, कान, नाक मुख, त्वचामेंसे) किसी एक स्थानसे निकलते हैं; किन्तु सन्तोंके प्राण ब्रह्मरन्ध्रसे निकलते हैं; इसलिए उनके श्राद्ध करनेकी या अग्नि संस्कार करनेकी भी आवश्यकता नहीं होती है । उच्च कोटिके सन्तका मन, बुद्धि एवं अहं नष्ट होकर उनकी आत्मा, ईश्वरसे एकरूप हो चुकी होती है; अतः वे अपनी इच्छासे या ईश्वरकी इच्छासे देह त्याग करते हैं । जब जीवात्माके मनोदेह या कारण देह या महाकारण देहका अस्तित्त्व रहता है तो उसकी विषय-वासनाओंमें आसक्ति होती है, ऐसेमें यदि वह योग्य प्रकारसे साधना न करे या कोई उच्च कोटिके देवता या गुरुकी विशेष कृपा न हो और उसकी शास्त्रोक्त पद्धतिसे मृत्योत्तर क्रिया-क्रम, श्राद्ध आदि न हो तो मृत्यु उपरान्त उस जीवके सांसारिक विषय-वस्तुमें अटकनेकी आशंका होती है; अतः उसकी शास्त्रानुसार अन्त्येष्टि, श्राद्ध इत्यादि विधि करनेसे उसे आगेके सूक्ष्म लोकोंमें प्रवास करना सरल होता है, वहीं सन्तोंकी सूक्ष्मदेह या आत्मा, सरलतासे उच्च लोकोंमें स्वतः ही प्रवास करती है एवं कुछ उच्च कोटिके सन्तोंकी आत्मा तो कुछ पलोंमें इस ब्रहमाण्डमें विलीन हो जाती है; अतः सन्तोंकी ‘मृत्यु’ हुई या उनका ‘निधन’ हो गया, यह कहना एक प्रकारसे उनका अपमान करना ही है । आप यदि सन्तोंके चरित्रका सूक्ष्मतासे अभ्यास करेंगे तो आपको ज्ञात होगा कि अनेक सन्त अपने देहत्यागकी पूर्वसूचना एवं उनके देहका क्या करना है, यह भी बताकर देहत्याग करते हैं । सामान्य व्यक्तिको मृत्युका भय सदैव सताता है, वहीं सन्त प्रेमसे सब जानकर अपना देह त्याग करते हैं; इसलिए हिन्दू धर्ममें सन्तोंको पूजनीय स्थान प्राप्त है ।
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