संन्यास या पूर्ण समय साधना करनेवाले लोग स्वार्थी नहीं होते (भाग-४)


यदि संन्यास लेना अनुचित होता तो हमारे मनीषी इस आश्रमका प्रतिपादन क्यों करते ? हमारे चार आश्रमोंमें संन्यास एक महत्त्वपूर्ण आश्रम है । वस्तुतः आश्रम तो दो ही होते हैं, एक ब्रह्मचर्य और दूसरा संन्यास, शेष दो आश्रमोंकी निर्मिति इसलिए की गई; क्योंकि प्रत्येक जीव ब्रह्मचर्यसे संन्यास आश्रममें छलांग नहीं ले सकता है; क्योंकि उन्हें उनके प्रारब्धके भोग भोगकर समाप्त करने होते हैं एवं जो विषयोंके प्रति आसक्ति या भोगके संस्कार हैं, उसे वह धर्म अधिष्ठित पद्धतिसे भोगे एवं धीरे-धीरे उसपर नियन्त्रण प्राप्तकर संन्यासकी ओर प्रवृत्त हो; इसलिए संन्याससे पूर्व वानप्रस्थ आश्रमका प्रतिपादन किया गया है । यह आश्रम संन्यासी बनने हेतु जीवकी पूर्वसिद्धता करता है । अर्थात यदि कोई व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रमसे या कुछ समय गृहस्थ आश्रममें रहकर संन्यास ले तो उसकी त्यागके वृत्ति अधिक है, ऐसा समझना चाहिए और हमारे समाजमें इसीलिए संन्यासियोंका बहुत सम्मान किया जाता है । यहां संन्यासियोंका सम्मान करनेका अर्थ है उनके त्यागका सम्मान करना, ऐसेमें संन्यासी स्वार्थी कैसे हुआ ?

पूर्ण समय साधना करनेवाला जीव भी संन्यासी समान ही होता है; क्योंकि उसका ध्येय भी ईश्वरप्राप्ति एवं राष्ट्र व धर्म हितार्थ सेवा करना होता है । मात्र दीक्षित संन्यासीके अनके शास्त्रोक्त नियम होते हैं, जिसका पालन करना अनिवार्य होता है अन्यथा ऐसा संन्यासी पापका अधिकारी होता है । वहीं पूर्ण समयका साधक मनसे संन्यास ग्रहण करता है ।

कलियुगमें संन्यास दीक्षा लेकर कर्मकाण्डके सर्व तत्त्वका पालन करते हुए साधना करना अत्यधिक कठिन होनेके कारण कुछ उच्च कोटिके सन्त गृहस्थोंको पूर्ण समय साधना करने हेतु कह रहे हैं, जिसमें उद्देश्य तो वही होते हैं; किन्तु कर्मकाण्डके बन्धन नहीं होते । वैसे भी संन्यासी मात्र नियमोंमें बंधकर, गेरुआ वस्त्र धारणकर, कुछ कर्मकाण्डके नियम पालनकर मुक्त नहीं हो सकता है । उसे साधना तो करना ही पडती है, चाहे कोई भी योगमार्गसे वह करे; अतः मेरी दृष्टिसे पूर्ण समय साधना करनेवाले साधक भी संन्यासी समान ही होते हैं और वे भी उतने ही सम्मानके अधिकारी होते हैं एवं इन्हें स्वार्थी कहना पूर्णतः अनुचित है ।



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