हमारे श्रीगुरुके अनुसार कलियुगमें व्यष्टि साधनाका महत्त्व ३० % एवं समष्टि साधनाका महत्त्व ७० % है और यह समीकरण कलियुगके आनेवाले ४ लाख २८ सहस्र वर्षोंतकके लिए सत्य रहेगा । इसका कारण हम आपको अनेक बार धर्मधारा सत्संगमें एवं अपनी लेखनद्वारा बता ही चुके हैं । व्यष्टि साधना करनेवाले साधकोंमें यदि कोई दुर्गुण हो तो वह दुर्लक्ष किया जा सकता है; किन्तु समष्टि साधना करनेवाले साधकोंके लिए, उनके दुर्गुण, साधना हेतु अवरोधक सिद्ध होते हैं ।
इसे एक उदाहरणसे समझ लेते हैं; जैसे एक साधकमें ‘समयबद्धता’ यह गुण नहीं है, तो उसका यह दुर्गुण सभी कार्योंमें परिलक्षित होगा । अब जैसे उसे सत्संग लेना है तो यदि उसमें समयबद्धता नहीं होगी तो सत्संगमें आए हुए श्रोता उसकी प्रतीक्षा करते रहेंगे । उसीप्रकार मान लीजिये, उसे चार साधकोंके साथ मिलकर ग्रन्थ प्रदर्शनी लगानी है और उसे सर्व प्रसार साहित्य लेकर प्रदर्शनी स्थलपर एक सुनिश्चित समयपर उपस्थित रहना है और यदि वह निश्चित किए गए समयपर नहीं आता है तो सभी साधकोंका समय व्यर्थ होगा एवं सभीको उसके प्रति अनुचित प्रतिक्रिया आएगी । इसप्रकार समष्टि साधना करनेवाले साधकोंके लिए उसके ‘दोष’ उसकी साधनाके मार्गको तो अवरुद्ध करता ही है, अन्योंको भी उनके दोषोंके कारण कष्ट होता है; अतः समष्टि साधना करनेवाले साधकोंको, उनके जो दोष समष्टि साधनामें अडचनें निर्माण करती हैं, उन्हें पहले दूर करनेका प्रयास करना चाहिए और दोष दूर करने हेतु स्वाभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया करना अति आवश्यक है । – तनुजा ठाकुर (२.१०.२०१७)
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