मनुस्मृति अनुसार, तत्त्व गुण, रजो गुण एवं तमो गुण क्या है ?


 सत्वं रजस्तमश्चैव त्रीन्विद्यादात्मनो गुणाम् |

 यैवर्याप्येमान्स्थितो भावान्महान्सर्वानशेषत: |

अर्थ : सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण, आत्माकी प्रकृतिके तीन गुण है | यह विशाल स्थावर व जंगम रुपी संसार इन तीन गुणोंसे व्याप्त होकर ही स्थित है |

यो यदैषां गुणो देहे साकल्येनातिरिच्यते |

तं तदा तद्गुणप्रायं तं करोति शरीरिणम् ||

अर्थ : सत्त्व,रज व तम-इन तीन गुणोंमें से प्राणीमें जिस गुणकी अधिकता पाई जाती है,वह उस गुणके लक्षणोंसे युक्त होता है |

सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रागद्वेशी रज: स्मृतम् |

एतद्व्याप्रिमदेतेषां सर्वभूताश्रितं वपु: ||

अर्थ : ज्ञानके सत्य रूपको जानना सत्त्वगुण का, अज्ञान अर्थात् जानने योग्य सत्यको जानना तमोगुणका एवं राग, द्वेष, मोह इत्यादि रजोगुणका लक्षण है |इन्हीं तीनों गुणोंसे सभी जीवोंका शरीर व्याप्त है |

तत्र य्त्प्रीतिसंयुक्तं किं चिदात्मनि लक्षयेत् |

प्रशान्तं इव शुद्धाभं सत्त्वं तदुपधारयेत् ||

अर्थ : मनुष्यकी आत्माको जिस गुणसे प्रसन्नता मिले, उसे शांति व निर्मल ज्योतिका अनुभव हो व उसका आचरण करनेकी जिज्ञासा होने लगे, उसे ही सत्त्वगुण जानें !

यत्तु  दुःखसतायुक्तमप्रीतिकरमात्मन:  |

तद्रजोऽप्रतितं विद्यात्सततं हारि देहिनाम् ||

अर्थ : आत्माके लिए अप्रिय, दुःखसे युक्त एवं मनको परमात्मासे विरक्त कर इन्द्रियोंके विषयमें लगानेवाले गुणको रजोगुण समझें !

यत्तु ल्यान्मोहसंयुक्तं अव्यक्तं विषयात्मकम् |

अप्रत्क्र्यंअविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ||

अर्थ : जो जीवको मोह व अज्ञानमें प्रवृत करें,अप्रकट रहस्योंकी ओर आकर्षित करें तथा जिसे तर्कसे न जाना जा सके, उसे ही तमोगुण समझना चाहिए |



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