सात्विक और तामसिक बुद्धि


‘वैदिक उपासना पीठ’के आश्रममें उच्च शिक्षित (मैकाले पद्धतिसे शिक्षित) युवा एवं युवती, देश-विदेशसे आते रहते हैं; किन्तु मैंने पाया है कि वे आजके शिक्षण पद्धति अनुसार, जो भी प्रचलित तथ्य है, उसे वे त्वरित स्मरणमें रख लेते हैं; किन्तु आरतीके समय गाए जानेवाले कुछ श्लोक या मन्त्र या भोजन मन्त्र प्रतिदिन दो या तीन बार बोलनेपर भी पन्द्रह दिवसमें भी उन्हें स्मरण नहीं होते । यह मैं गत (पिछले) चार वर्षोंसे देख रही हूं । जब मैंने इसके सूक्ष्म कारणोंका अभ्यास किया तो ज्ञात हुआ कि बुद्धिके दो प्रकार होते हैं, सात्त्विक बुद्धि और तामसिक बुद्धि ।
 आजका हिन्दू भोजन, वस्त्र और भाषा सबमें पाश्चात्योंका अंधा अनुकरण करता है; अतः उसकी बुद्धि तामसिक हो चुकी है, वह तमोगुणी तथ्योंको त्वरित ग्रहण कर लेता है; किन्तु सात्त्विक तथ्योंको ग्रहण करनेमें या स्मरण करनेमें उसे अत्यधिक कष्ट होता है । मैं आध्यात्मिक शोध हेतु ऐसे सभी आगंतुकोंको उन आठ-दस श्लोकोंको स्मरण करने हेतु कहती हूं; किन्तु इसे भी वे सहज स्मरण नहीं कर पाते हैं । इससे ही हिन्दुओंने पारम्परिक वस्त्र, पारम्परिक सात्त्विक भोजन एवं संस्कृत तथा प्रादेशिक भाषाओंको अपने जीवनका अंग क्यों बनाना चाहिए ?, यह ध्यानमें आता है ! मैंने ऐसे विरले ही जिज्ञासु या साधकको पाया है, जो अध्यात्मके तत्त्वोंको या संस्कृतके श्लोकोंको सहज ही स्मरणमें कर ले, जबकि मुझे इन्हें आत्मसात करनेमें अधिक कठिनाई कभी नहीं हुई और अब मुझे ज्ञात होता है कि मुझे बाल्यकालसे पाश्चात्योंके वस्त्र, अलंकार, भाषा, भोजन कभी भी प्रिय नहीं रहे हैं, मुझे नहीं स्मरण है कि मैंने कभी पाश्चात्योंकी इन बातोंको अपनी रुचिसे किया हो, धर्मप्रसारके मध्य यदि कभी परिस्थितिवश कुछ करना पडे तो उसे अनमने मनसे अर्थात दूसरोंका मन रखने हेतु अवश्य किया है, जैसे विदेश जानेपर कभी किसीके यहां ‘पिज्जा’ खाना पडा है; किन्तु मैंने क्रयकर या रुचिसे इसे कभी नहीं खाया है ।
आज स्मरणहीनता, यह एक अत्यन्त सामान्य स्वभावदोष है, पहले मुझे यह लगता था कि उच्च शिक्षित होनेपर भी आजका हिन्दू आठ पंक्तियोंका श्लोक कैसे स्मरण नहीं कर पाता है ?; किन्तु अब मुझे ज्ञात हो गया है कि दैवी बुद्धि और आसुरी बुद्धिमें भेद होता है; अतः अब हिन्दुओंको धर्म और अध्यात्म सिखानेके स्थानपर उन्हें आचारधर्म सिखाना आरम्भ किया है, जिससे उनमें सत्त्व गुण बढे, जैसे प्रातः सूर्योदयसे पूर्व उठें, प्रतिदिन स्नान करें (जी हां, आज अनेक हिन्दू प्रातःकाल एवं प्रतिदिन स्नान भी नहीं करते हैं), तिलक लगाएं, जींस या अनारकली या आजके प्रचलित तमोगुणी वस्त्र न पहनें, दोपहरमें न सोए, रात्रिमें ग्यारह बजेके पश्चात न जागें, काले वस्त्र धारण न करें, पुरुष शिखा रखें, स्त्रियां केश बांधकर रखें, मोबाइल, इन्टरनेटका उपयोग अधिक न करें इत्यादि ! क्योंकि अतिदक्षता विभागमें (ICU में) पूरी-तरकारी (भाजी) नहीं दी जाती है, वहां तो सुई, कडवी गोली और उबले अन्न दिए जाते हैं, आजका हिन्दू समाज पाश्चात्योंकी मलेच्छ संस्कृतिके अंधे अनुकरण एवं अपनी वैदिक संस्कृति और धर्मके विस्मरणके कारण अतिदक्षता विभागमें (ICU में) है !  – तनुजा ठाकुर, संस्थापिका , वैदिक उपासना पीठ



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