अवैध प्रवेश कर चुके रोहिंग्याको भारतमें निवास करनेकी सुविधा प्रदान करना उच्चतम न्यायालयको अमान्य, कहा- निर्धारित प्रक्रियाके अन्तर्गत किया जाएगा निर्वासन 


१० अप्रैल, २०२१
 जम्मूमें अवैध रोहिंग्या प्रवासियोंको ‘डिटेंशन कैम्प’में रखने तथा वहांसे उन्हें पुनः म्यामांर भेजनेके निर्णयके विरुद्ध एक याचिका अधिवक्ता प्रशांत भूषणद्वारा प्रस्तुत की गई थी । अवैध रोहिंग्या प्रवासियोंके लिए यह याचिका सलिमुल्लाहकी ओरसे प्रशांत भूषणने प्रस्तुत की थी । इसपर २३ मार्च २०२१को चर्चा करते हुए प्रशांत भूषणने अन्तरराष्ट्रीय न्यायालयके निर्णयको स्मरण करवाया था । भारत शासनका पक्ष लेते हुए
‘सॉलिसिटर जनरल’ तुषार मेहताने कहा कि इन्हें इनके देश पुनः भेजना अनुच्छेद २१का उल्लंघन नहीं है; क्योंकि भारतने ऐसी किसी भी अन्तरराष्ट्रीय सन्धिपर हस्ताक्षर नहीं किए हैं । इन्हें शरणार्थी न कहकर अवैध प्रवासी कहना उचित होगा । जम्मू-कश्मीर शासनकी ओरसे हरीश साल्वे उपस्थित थे ।
 मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायाधीश ए एस बोपन्ना तथा न्यायाधीश व्ही रामसुब्रमनियमने इस याचिकापर निर्णय देते हुए कहा कि म्यामांरमें रोहिंग्याओंकी स्थिति विकट है; परन्तु यह भारतीय न्याय व्यवस्थाके अधिकार क्षेत्रमें नहीं आता । इन्हें अन्तरिम सुविधा प्रदान करना असम्भव है । अवैध प्रवासियोंकी निर्वासन सम्बन्धी पूर्ण प्रक्रिया पालन करनेके उपरान्त ही इन्हें म्यांमार भेजा जाए ।
    लाखों रोहिंग्या भारतमें अवैध प्रवेश कर भारतके अनेक राज्योंमें निवास कर रहे हैं । इनकी संख्या जम्मू-कश्मीर, बंगाल आदि उत्तर-पश्चिम राज्योंमें सर्वाधिक है । अनेकने कूट परिचयपत्र बनवाकर यहां चाकरीतक प्राप्त कर ली है । इनकी संख्या इतनी अधिक है कि इनका निर्वासन शासनके समक्ष एक समस्या ही है । वामपन्थी, कांग्रेस तथा तृणमूल जैसे देशद्रोही पक्ष इनके मत प्राप्त कर शासन करनेका स्वप्न देखते हैं । इसलिए उन्हें इनकी चिन्ता रहती है; परन्तु वास्तवमें ये भारतीय अर्थव्यवस्थाको लगे कीटकोंके समान हैं । अतः इन्हें इनके देश निर्वासित करना आवश्यक है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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