हिन्दू महिला, मुसलमान व्यक्ति एवं दूसरा विवाह, उच्च न्यायालयने कहा, “विशेष विवाह अधिनियमके अन्तर्गत, यह स्वीकार नहीं ।”
१२ सितम्बर, २०२१
गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने एक निर्णयमें हिन्दू महिलासे मुसलमान पुरुषके दूसरे विवाहको वैध नहीं माना है । न्यायालयने कहा कि विशेष विवाह अधिनियमकी धारा-४, इस प्रकारके विवाहको सुरक्षा प्रदान नहीं करती; अतः यह विवाह मान्य नहीं है ।
‘लाइव लॉ’के विवरणके अनुसार, न्यायाधीश कल्याण राय सुराणाने एक विधवाकी याचिका निरस्त करते हुए यह बात कही । वस्तुत: मुसलमान व्यक्तिकी हिन्दू विधवाने पतिकी मृत्युके पश्चात भी उसे निवृत्ति वेतन (पेंशन) या अन्य दूसरे लाभ न मिलनेके परिवादको लेकर उच्च न्यायालयमें याचिका प्रविष्ट की थी । न्यायाधीश सुराणाने विशेष विवाह अधिनियमकी धाराके साथ-साथ मृत मोहम्मद सलीम अथवा शमशुदीनका वर्णन करते हुए, सर्वोच्च न्यायालयके निर्णयका भी उल्लेख किया । सर्वोच्च न्यायालयके निर्णयके अनुसार, विशेष विवाह अधिनियमकी धारा-४ के अन्तर्गत मुसलमान पुरुषद्वारा की गई दूसरी ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ अमान्य है ।
न्यायलयने इस बातका भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता आज भी अपने हिन्दू नामका उपयोग कर रही हैं । उनके पास इस बातको प्रमाणित करने का भी कोई अभिलेख (रिकॉर्ड) नहीं है । विवाहके पश्चात उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था । न्यायालयने याचिकाकर्ताके अवयस्क पुत्रके निवृत्ति वेतन एवं दूसरे लाभोंका अधिकारी होनेके प्रतिवादको (दावेको) भी निरस्त कर दिया ।
न्यायालयका यह निर्णय स्वागत योग्य है । कुछ हिन्दू अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु, किसी भी प्रकारके धर्म बन्धनको स्वीकार नहीं करते है, ऐसे जो लोग मनानुसार आचरण करते है, उनके लिए नूतन भारत में कोई स्थान नहीं होना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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