अपनी सेवा दूसरोंको देते समय असुरक्षाकी भावना न आने दें!


कुछ साधक कुछ विशिष्ट सेवा कुछ वर्षोंसे या कुछ माहसे कर रहे होते हैं किन्तु जब उन्हें उनकी सेवा किसी अन्य साधकको सौंपने हेतु कहा जाता है तो उनमें असुरक्षाकी भावना आ जाती है ऐसे साधकोंको यह सूचित करना चाहेंगे कि अपनी सेवा दूसरोंको देते समय किंचित मात्र भी असुरक्षा न आने दें । राष्ट्र रक्षण और धर्म प्रसारकी समष्टि साधना करनेवाली संस्थाओंके पास इतनी सेवा है कि जो साधक या कार्यकर्ता इसमें संलग्न होते हैं उनके पास आठ घंटे नियमित सोनेका भी समय नहीं होता है और हमें सम्पूर्ण विश्वको कर्म हिन्दू बनाना है इसलिए सेवायें बहुत रहती हैं । साथ ही ध्यान रखें, ईश्वरप्राप्त हेतु सर्वस्वका त्याग करना पडता है जो अपनी सेवा दूसरोंको नहीं दे सकते हैं या सिखा सकते हैं, वे अपना सर्वस्व कैसे अर्पण करेंगे; इसलिए सेवा गुरु आज्ञा अनुरूप दूसरोंको सीखना और सौंपना भी एकप्रकारका त्याग है । त्यागसे गुरु और ईश्वर प्रसन्न होते हैं और अगली सेवा देते हैं । अपनी सेवा दूसरोंको सीखानेसे नेतृत्व गुण बढता है ।



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