अब शैक्षणिक संस्थानोंमें ५% मुस्लमान आरक्षणकी मांग !


जुलाई ३१, २०१८

मराठा आरक्षणकी मांगके साथ ही मुस्लिम आरक्षणकी मांग भी उठने लगी है । मुसलमान नेताओंका मानना यही है कि न्यायालयके आदेशके पश्चात भी शिक्षा क्षेत्रमें ५% आरक्षण शासन लागू नहीं कर रहा है । मराठा आरक्षणमें ‘वोट बैंक’को देखकर शासन सहित दूसरे दल भी मराठा आरक्षणकी बात कर रहे हैं, जबकि आर्थिक रुपसे दुर्बल और शैक्षणिक रूपसे पिछडे मुसलमान वर्गको आरक्षण लागू करनेके लिए रंगनाथ समिति के विवरणको भी शासनने अभी रोक रखा है ।

मुसलमान नेता अब शासनपर आक्षेप कर रहे हैं कि जाति और धर्मके आधारपर शासन आरक्षण देनेका इच्छुक है, जिन्हें आवश्यकता है, उन्हें नहीं । १६% मराठा आरक्षणकी मांगके स्थानपर केवल ५% आरक्षण शैक्षणिक संस्थानोंमें मुस्लिम नेताओंकेद्वारा मांग की जा रही है । मुसलमान नेताओंका तर्क यह भी है कि न्यायालयने रंगनाथ समितिकी बातोंके आधार पर ही शैक्षणिक संस्थानोंमें मुसलमान छात्रोंके प्रवेश सहित दूसरे प्रकरणमें आरक्षण देनेकी बात की गई है, जिसपर शासनने कोई कार्यवाही नहीं की है । मुस्लिम आरक्षण होने से ही पिछडे मुस्लिम वर्गका उत्थान हो सकता है, जिससे वह मुख्यधारामें भी जुड सकते हैं, ऐसा मुसलमान नेताओंका तर्क है ।

औरंगाबादसे ‘एआईएमआई’के विधायकका कहना है कि “शासन केवल मराठोंके लिए ही बोल रहा है ।  मुम्बई उच्च न्यायालयने कहा है कि मुसलमानोंको ५ % आरक्षण मिलना चाहिए, परन्तु क्यों तुम उस बात पर चर्चा नहीं कर रहे ?” बात यहीं समाप्त नहीं होती, मुसलमान नेताओंका यह भी कहना है कि मराठा मतदाताओंको देखते हुए उन्हें लुभानेके लिए केवल शासन ही नहीं, दूसरे दल भी आगे बढकर आ रहे हैं ।
जिन दलोंके स्वामीने कभी आरक्षणकी पैरवीकार नहीं की थी, अब उन दलोंके अध्यक्ष भी आरक्षणकी मांगको लेकर सबसे आगे आ रहे हैं । शिव सेना उसी प्रकारका एक उदाहरण है । गत दिवसोंमें मराठा आरक्षणके आंदोलनकारियोंने जिस प्रकारसे महाराष्ट्रके कई भागमें विरोध किया उस विरोधसे शासन भयभीत दिख रहा है और उन्हें आरक्षण देकर सन्तुष्ट करना चाहता है, जबकि मुस्लिम आरक्षणके स्वर अब और सशक्त हो रहे है ।

समाजवादी दलके नेता अबू आजमीके अनुसार गत 4 वर्षोंसे विधानसभामें वे चीख चीखकर कर रहे हैं कि मुसलमानोंका आरक्षण जिस प्रकारसे न्यायालयने कहा है, उसपर चर्चा की जाए और उसे दिया जाए; लेकिन शासन चुप्पी साधे बैठा है । केवल अपने ही लोगोंमें आरक्षण बांट रही है । निश्चित रूपसे मुसलमान समाज पिछडा हुआ है ।

महाराष्ट्र शासनमें पिछले दो दशकोंसे सत्तामें रहे एनसीपी मराठा आरक्षणको तो अनिवार्य करनेके लिए कह रही है । यद्यपि सत्तामें रहते हुए मराठा आरक्षण लागू नहीं कर सकी । मुस्लिम आरक्षणकी बात भी एनसीपीकेद्वारा आरम्भ की गई है; लेकिन मराठा आरक्षणके स्वरको अधिक सशक्त किया गया है । एनसीपीकी ओरसे यह भी स्पष्ट किया गया है कि मुस्लिम आरक्षण भी आवश्यक है; लेकिन प्रथम मराठा आरक्षणको लागू करनेके लिए शासनपर बल देनेका प्रयास किया गया है ।

ज्ञात है कि एनसीपीमें भी मराठाओंका वर्चस्व है । एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार स्वयं मराठा है, उनके भतीजे अजित पवार भी मराठा आरक्षणकी पैरवी करते हुए स्पष्ट करते हैं कि मराठाओंमें कई लोग पिछडे हैं, जिन्हें आरक्षणकी आवश्यकता है । अब शासनके सामने समस्या यह है कि अन्ततः १६% आरक्षण मराठा और ६% आरक्षण मुस्लिम समुदायको किस प्रकारसे लागू करे ? उच्चतम न्यायालयके आदेश और अनुसंशाको किस प्रकारसे लागू करे । यद्यपि राज्य शासन इस प्रकरणपर कुछ इस तरह से अपना मत रख रहा है; लेकिन आरक्षणको लागू करनेमें कई अभी लक्ष्य प्राप्त करने हैं और इस बात से अवगत भी करा रहे । आरक्षण लागू करने में शासनकी कोई भी दुर्भावना नहीं है ।

यद्यपि शासन अपनी भूमिका कितनी भी स्पष्ट कर ले; लेकिन आरक्षणको लागू करनेमें उसे कई अडचनोंको शासनके वित्त मन्त्री सुधीर मुनगंटीवारके अनुसार मुस्लिम समाजके लिए ऐसा नहीं है कि शासनने सोचा नहीं और उनके लिए कार्य नहीं किया, शासनने औरंगाबादमें विश्वविद्यालय आरम्भ किया है । दल प्रत्येक तक लाभ पहुंचानेको प्रतिबद्ध है, भले ही इसके लिए राज्यपर आर्थिक दबाव पडेगा । राजनीतिक दल अपने कार्यकालमें कुछ नहीं कर पाए, इसी शासनसे हल चाहते हैं ! भले ही मराठा आरक्षण लागू होनेके पश्चात अन्तिम लाभ किन लोगोंको मिलेगा ?, यह तो समय बताएगा ।

स्रोत : जी न्यूज



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