शमी पौधेसे सम्बन्धित विशेष तथ्य (भाग-२)


• यह वृक्ष जेठके महीनेमें भी हरा रहता है । ऐसी गर्मीमें जब रेगिस्तानमें जानवरोंके लिए धूपसे बचनेका कोई सहारा नहीं होता, तब यह पेड छाया देता है । जब खाने हेतु कुछ नहीं होता है, तब यह चारा देता है, जो ‘लूंग’ कहलाता है ।

• इसका फूल ‘मींझर’ तथा फल ‘सांगरी’ कहलाता है, इसके फलकी तरकारी बनाई जाती है । यह फल सूखनेपर ‘खोखा’ कहलाता है जो सूखा मेवा है ।

• इसकी लकडी पुष्ट होती है जो किसानके लिए जलाने और ‘फर्नीचर’ बनानेके उपयोगमें आती है । इसकी जडसे हल बनता है ।

• वराहमिहिरके अनुसार, जिस वर्ष शमीवृक्ष अधिक फलता-फूलता है, उस वर्ष सूखेकी स्थितिका निर्माण होता है । विजयादशमीके दिन इसकी पूजा करनेका एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आनेवाली कृषि विपत्तिका पूर्वमें ही सङ्केत दे देता है जिससे किसान अधिक पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्तिसे छुटकारा पा सकते हैं ।

• अकालके समय रेगिस्तानके मनुष्य एवं जानवरोंका यही एक मात्र सहारा है । सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पडा था जिसे ‘छपनिया’ अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तानके व्यक्ति इसी पेडके तनोंके छिलके खाकर जीवित रहे थे ।

• इस पेडके नीचे अनाजकी उपज अधिक होती है ।

• पाण्डवोंद्वारा अज्ञातवासके अन्तिम वर्षमें गाण्डीव धनुष इसी पेडमें छिपाए जानेके उल्लेख मिलते हैं ।

• शमी अथवा खेजडीके वृक्षकी लकडियां यज्ञकी समिधा हेतु पवित्र मानी जाती हैं । बसन्त ऋतुमें समिधा हेतु शमीकी लकडीका उपयोग बताया गया है । इसी प्रकार वारोंमें शनिवारको शमीकी समिधाका विशेष महत्त्व है ।

• शमी शनि ग्रहका पेड है जो सबसे अधिक राजस्थानमें होता है । यह छोटे तथा मोटे कांटोंवाला भारी पेड होता है ।

• विजयादशमीके अतिरिक्त कुछ स्थानपर कृष्ण जन्माष्टमीको भी इसकी पूजा की जाती है ।



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