क्या असुर, सन्तोंको या अच्छे आध्यात्मिक स्तरके साधकोंको भी आवेषित कर सकते हैं अर्थात उन्हें अपने नियन्त्रणमें ले सकते हैं ? क्या ऐसा होनेपर वे मद्यपान (शराब पीना) परस्त्री गमन, धनके प्रति आकर्षण या अपने पुत्र जो अधिकारी न हो, उन्हें अपना उत्तराधिकारी बना सकते हैं ? मैं विदेशमें रहती हूं एवं यहां कुछ गुरुओंके आश्रममें ऐसा हो रहा है, यह देखकर मेरे मनमें ऐसे प्रश्न आपके लेखोंको पढनेके पश्चात आपसे पूछनेकी इच्छा हुई ! - एक साधक, मॉरीशस


हमारे श्रीगुरुने एक बार बताया था कि अध्यात्ममें कोई कभी भी गिर सकता है अर्थात वह यदि ९०% पर आध्यात्मिक स्तरपर पहुंच जाए तो भी अपने दोषों एवं अहंके कारण गिर सकता है ।
        जी हां, सन्त या साधक किसी भी आध्यात्मिक स्तरपर अनिष्ट शक्तियोंद्वार आवेशित हो सकते हैं या उनके नियन्त्रणमें जा सकते हैं । और ऐसा होनेपर उनका वर्तन धर्म और नीति विरुद्ध हो जाता है । उनके आचरणमें आप माया, मोह और वासनाके अर्थात अधर्मके लक्षण स्पष्ट देख सकते हैं ! कोई साधक यदि वाममार्गी हो तो वह मद्यपान, अपनी तन्त्र साधना अन्तर्गत कर सकता है; किन्तु यदि वह उस मार्गका साधक न हो तो ऐसा करनेका अर्थ है कि वह यह कृत्य किसी आसुरी शक्तिके प्रभावमें कर रहा होता है ।
इसलिए दोष निर्मूलन एवं अहंनिर्मूलन करना अति आवश्यक होता है । दोष और अहं, इन दोनोंके माध्यमसे ही अनिष्ट शक्तियां सामान्य व्यक्ति, साधक या सन्तोंके सूक्ष्म देहमें स्थान बनाती हैं !
सन्तोंमें भी आध्यात्मिक स्तर होता है जैसे कि ७०% आध्यामिक स्तरके सन्त हैं तो भी उनका मन, अहं व बुद्धिका पूर्ण लय नहीं होता है एवं वे कुछ प्रमाणमें शेष रहते ही हैं; इसलिए सन्तोंने भी मोक्ष मिलनेतक सतर्क होकर साधना करते रहना चाहिए जिससे मन, बुद्धि व अहंका लय होता रहे !
      यदि उनमें एक भी दोष तीव्र हो तो वे उनके पतनका कारण बन सकता है ! उदाहरण देखते हैं जैसे किसीको पुत्रसे अत्यधिक आसक्ति हो और यदि वे ७०% आध्यात्मिक स्तरपर हों तो ऐसी आशंका है कि योग्य शिष्यके होते हुए भी वे अपने पुत्रको अपने आश्रमका उत्तराधिकारी बना दें । और यह आज कुछ आश्रमोंमें हुआ भी है !  इसी प्रकार साधक या सन्त भिन्न प्रकारके प्रलोभनमें पड सकते हैं । किसीके मनमें सुख या ऐश्वर्य भोगनेके सूक्ष्म संस्कार हों तो वे साधना करनेसे जो रिद्धि-सिद्धियोंके कारण धन, ऐश्वर्य मिलने लगता है, उसके लोभमें पडकर योगीसे भोगी बन सकते हैं !
  वैसे ही आज जो कथावाचक, सर्वधर्म समभावका राग व्यासपीठसे आलापते हैं, वे सब भी यश और धनके लोभमें अनिष्ट शक्तियोंके नियन्त्रणमें चले गए हैं और कुछ तो स्वयं कहते हैं कि ‘अली मौला’ मेरे मुखसे निकलने लगा है ! अब भूतावेषित देहसे तो यही निकलेगा न; इसलिए साधकोंको बहुत ही सतर्क रहना चाहिए ।
  आपका प्रश्न बहुत अच्छा था और आपको बता दें आज ७०% कथावाचक, प्रवचनकार, जगराता करनेवाले, भजनके माध्यमसे प्रसार करनेवाले, अनिष्ट शक्तियोंके प्रभावमें हैं; इसलिए आप उनके आचरण और उनके उपदेशोंमें साम्यता नहीं दिखेगी ।
     और समष्टि साधना करनेवाले १००% साधकोंको (जो साधक राष्ट्ररक्षण एवं धर्म जाग्रति या धर्म शिक्षण देने हेतु निष्काम भावसे सेवा करते हैं) अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है; क्योंकि अनिष्ट शक्तियां चाहती नहीं है कि हिन्दू राष्ट्र रूपी रामराज्य आए  । इसलिए गुरुकी शरणमें रहकर ही समष्टि साधना करना चाहिए उससे गुरुकृपाके कवचसे साधकका रक्षण होता है !
      वर्तमान युगमें दोष निर्मूलन एवं अहंनिर्मूलनकी साधनाको इसलिए अत्यधिक प्राथमिकता देना चाहिए तथा समष्टि कार्य करनेके कारण जो सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियां, मन एवं बुद्धिपर काला आवरण निर्माण करती हैं, उसे दूर करने हेतु नित्य आध्यात्मिक उपचार करना चाहिए ! यह दोनों नियमित होनेसे ही साधना फलित होती है  !


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