एक व्यक्तिने पूछा है कि हम और आप सब मैकालेकी शिक्षण पद्धतिसे ही शिक्षित हुए हैं तो भी आप उसे आसुरी शिक्ष्ण पद्धति क्यों कहती हैं ?


     यदि मैं और आप मांस भक्षण करें तो क्या वह तामसिकसे सात्त्विक आहार हो जायेगा ? नहीं  न ।  उसीप्रकार आज समाजमें जो भी सात्त्विक हैं, परोपकारी या राष्ट्रनिष्ठ हैं, वे इस शिक्षण पद्धतिके कारण नहीं है, कुछके पूर्व जन्मके संस्कार बहुत ही दृढ थे; इसलिए इस आसुरी शिक्ष्ण पद्धतिसे शिक्षित होनेपर भी उनकी वृत्ति सात्त्विक रही, कुछ अपने धर्मगुरुओंकी सीखके कारण सात्त्विक बने हैं तो कुछ अपने माता-पिताके सीखके कारण अच्छे हैं !
     जिस शिक्षण पद्धतिसे उच्च शिक्षित व्यक्ति भी हिन्दू देवी-देवताओंको अपशब्द कहे, राष्ट्रद्रोह करे, अपने वृद्ध माता-पिताकी सेवा करनेके स्थानपर उन्हें वृद्धाश्रम छोड आए, राष्ट्र व समाज हितके धनको  स्वयंके निजी स्वार्थ हेतु उपयोग करे, व्यभिचार करे, उसने विद्या प्राप्ति की है यह कैसे कहा जा सकता है ?,  यह बताएं !
     इस शिक्षण पद्धतिके कारण समलैंगिकता एवं लिव-इन को मान्यता मिल गई, इसे मान्यता देनेवाले कौन हैं ?, इसी आसुरी शिक्षण पद्धतिसे उपजे तथाकथित बुद्धिजीवी ! यह राष्ट्र सर्वनाशकी और बढ रहा है, इसके लिए कौन उत्तरदायी है, इस शिक्ष्ण पद्धतिसे शिक्षित अदूरदर्शी एवं स्वार्थी राजनेतागण ! और तो और जिस ‘डाइवोर्स’का नाम तक हमारे समाजमें नहीं था वह नित्य बढ रहा है. इसके लिए कौन उत्तरदायी है किंचित सोचें ! अर्थात समाज और परिवार व्यवस्थातक टूट रही है, इन सबका मूल ढूंढेंगे तो आपको इसके लिए यह शिक्षण पद्धति ही ध्यानमें आएगी |
     आज सामजमें जिस प्रमाणमें मानवीय मूल्योंका पतन हुआ है वह अशिक्षितसे अधिक शिक्षितोंद्वारा हुआ है एवं हो रहा है | आप तो देख ही रहें है चाहे कोई भी क्षेत्र हो वहां भ्रष्टाचार या अनैतिकता न व्याप्त हो ऐसा है ही नहीं ! इस देशमें जहां सबसे अधिक शिक्षित लोग हैं वहां सबसे अधिक गोमांस खाया जाता है तो क्या अभी भी हम कह सकते हैं कि हमारी शिक्षण पद्धति आसुरी नहीं है !
     इस देशमें यदि लोगोंकी वृत्तिमें परिवर्तन लाना है तो सर्वप्रथम शिक्षण पद्धतिको परिवर्तित करना होगा ! इसलिए जैसे ही यह देश हिन्दू राष्ट्र हो जायेगा वैसे ही इस निधर्मी शिक्षण पद्धतिको सम्पूर्ण भारतमें हटाकर धर्म अधिष्ठित शिक्ष्ण पद्धति आरम्भ किया जाएगा ! मैं तो एक-एक दिन हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु गिन रही हूं एवं उस हेतु यथासंभव प्रयास कर रही हूं तथा अन्योंसे भी करवा रही हूं; क्योंकि यही सभी समस्याओंका एकमात्र उपाय है !


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