शंका समाधान – रजोधर्मके समय स्त्रीकी दिनचर्या कैसी होना चाहिए ? (भाग-१)


यू ट्यूबमें वैदिक उपासना पीठके चैनलपर  (www.youtube.com/channel/UCJo24kpOckCT51P_2wEjE8Q) दर्शकने प्रश्न पूछा है जो इस प्रकार है –
रजोधर्मके समय लडकियोंकी दिनचर्या कैसी होनी चाहिए ? वे क्या नामजप व ध्यान कर सकती हैं ? – साधना कुमारी
आपका प्रश्न बहुत अच्छा है, इसका ज्ञान आजकी युवतियोंको नहीं है; क्योंकि पुत्रियोंको धर्मकी शिक्षा देनेवाली आजकी माताओंको भी इसका ज्ञान नहीं है । और धर्मप्रसारके मध्य मैंने पाया है कि वर्तमान कालमें ८०% युवतियों एवं २० से ४० वर्षकी आयुको रजोधर्मसे सम्बन्धित मध्यमसे तीव्र स्तरका आध्यात्मिक कष्ट होता है । वैसे तो इस कालमें सभी स्त्रियोंको थोडा कष्ट होता ही है; किन्तु आजके कालमें इससे सम्बन्धित कष्टकी तीव्रतामें अत्यधिक वृद्धि देखी गई है; इसलिए इस प्रश्नका उत्तर मैं एक लेखमालाके रूपमें दे रही हूं ।
        हिन्दू धर्ममें हमारे मनीषियोंने, इस कालके सम्बन्धमें बहुत उपयोगी तथ्य बताए थे जो लाखों वर्ष पश्चात भी उतना ही उपयोगी हैं । तो आपको इस सम्बन्धमें हम बताएंगे । आपसे विनती है कि अपनी युवा होती पुत्रियोंको यह लेखमाला अवश्य पढाएं !
सर्वप्रथम हम आजके कालके अनुसार रजोधर्मके मध्य एक युवतीकी दिनचर्या कैसी होनी चाहिए ?, इस सन्दर्भमें कुछ आवश्यक तथ्य जान लेते हैं ।
रजोधर्म है क्या  ?
रजोधर्म या मासिकधर्मको माहवारी, मासिक इत्यादि नामोंसे जाना जाता है । यह महिलाओंमें होनेवाली प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके विषयमें हर लडकीको जानकारी होनी चाहिए; किन्तु आज भी कई ऐसी लडकियां हैं, जिन्हें मासिकधर्मके बारेमें पूरी जानकारी नहीं होती है, जिसके कारण उन्हें मानसिक और शारीरिक समस्याओंका सामना करना पडता है । तो आइए ! सर्वप्रथम जानते हैं क्या है रजोधर्म ?
महिलाओंमें मासिकधर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो १२ से १४ वर्षकी आयुसे आरम्भ होकर ४० से ५५ वर्षकी आयुतक होता है । मासिकधर्मका आरम्भ होना लडकियोंके शरीरमें अन्तःस्रावमें (हार्मोन्समें) होनेवाले परिवर्तनसे होता है; किन्तु यह मासिकधर्म सभी लडकियोंको एक ही आयुमें हो ऐसा आवश्यक नहीं है एवं वह सामान्यतः १२ से १४ वर्षकी आयुतक आरम्भ हो जाता है; किन्तु आज तमोगुणी, तनावयुक्त एवं लैंगिक ज्ञान होनेके कारण कुछ लडकियोंको यह मासिकधर्म ८ से ११ वर्षमें भी आरम्भ होने लगा है जो वस्तुतः समाजशास्त्रियोंके लिए चिन्ताका विषय है ।
 यदि अन्य धर्मोंके (पन्थ कहना अधिक उचित होगा) इतिहासका अभ्यास किया जाए तो सभीमें रजोधर्मसे सम्बन्धित कुछ न कुछ नियमपालनकरने हेतु बताए गए हैं; किन्तु हिन्दू धर्मका अध्यात्मशास्त्र प्रगत होनेके कारण इसमें जो इस विषयमें ज्ञान दिया गया है, वह मात्र तर्कसंगत ही नहीं है; अपितु सूक्ष्म अध्यात्मशास्त्रके मूल तत्त्वोंपर आधारित है एवं इनका पालन करनेसे स्त्रियोंको शारीरिक लाभ ही नहीं मिलते हैं; अपितु अध्यात्मिक लाभ भी मिलता है, जो हम आगेके लेखोंमें शृंखलाबद्ध रीतिसे जानेंगे !
     सर्वप्रथम यह जान लें कि रजोधर्मका काल हिन्दू धर्म शास्त्र अशौचका काल माना गया है । अशौच अर्थात अशुद्धिका काल । इसका मुख्य कारण है कि शरीरके भीतर जो अनावश्यक रक्त एकत्रित हुआ है उसके निष्कासनका काल है । रक्तके इस निष्कासनकी प्रक्रियाको राजसिक कृत्य माना गया है एवं शरीरके लिए अनावश्यक रक्त त्यागको मल व मूत्र समान तामसिक माना गया है । इसलिए रजोधर्मके समय कुछ विशेष आचारधर्मका पालन वैसे ही करने हेतु कहा गया है, जैसे मल व मूत्र त्यागके समयके आचारधर्म बताए गए है । (मल-मूत्रसे सम्बन्धित आचारधर्म जानने हेतु आप सनातन संस्थाद्वारा प्रकाशित ग्रन्थ ‘दिनचर्या’ पढ सकते हैं और इसके विषयमें हमने आपको कुछ तथ्य धर्मधारा श्रव्य सत्संगमें भी बताए ही हैं) । बोधयान धर्मसूत्रके अनुसार प्रथम तीन दिवस व तीन रात्रिके कालको अशुद्ध काल माना गया है एवं यह काल अस्थायी अशौच कालके रूपमें जाना जाता है । (२.२ .४.४) पराशर स्मृतिके अनुसार चार दिवस पश्चात यदि किसी रोगके कारण या हार्मोनल imbalance के कारण रक्तस्राव होता रहता है तो उसे अशौच नहीं माना जाएगा । (७. १६-१७) इसके विषयमें स्त्रीधर्मपद्धतिके विषयमें विस्तारसे बताते हुए रजोधर्मकी चार श्रेणियोंका उल्लेख करते हुए बताया गया है कि रजोधर्ममें चार कारणोंमेंसे रोग, भावनात्मक पीडा, अन्तःस्राव ग्रन्थिरस असन्तुलन व सामान्य मासिक रजस्वलाको ही अशौचकी श्रेणीमें रखा जा सकता है ।
 कल आपको हम शौच और अशौचके विषयमें आध्यात्मशास्त्रीय जानकारी देंगे, जिससे आपको यह विषय और अच्छेसे समझमें आएगा ।


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