शंका समाधान


प्रश्न :  ‘जबसे आपने ‘ॐ हं हनुमते नमः’का जप करने कहा है, तबसे मैं इसे करनेका प्रयास कर रहा हूं; परन्तु जब मैं यह जप करता हूं, तब मुझे अत्यधिक उष्णताका अनुभव होता है, जिससे मुझे घबराहट होने लगती है, मुझे थकावट भी होने लगती है; परन्तु कुछ माला करनेके पश्चात् मेरे कष्ट न्यून हो जाते हैं और मुझे शांतिकी अनुभूति होती है, ऐसा क्यों होता है ?’, यह जानना चाहता हूं ?; परन्तु जब मैं अपने इष्टदेवताका मन्त्र ‘ॐ नमः शिवाय’का जप करता हूं तब कष्ट नहीं होता ऐसा क्यों ? – बिरेश बनर्जी, देहली
उत्तर : हनुमानजीके जपसे किसी व्यक्तिको कभी भी कष्ट हो ही नहीं सकता, यह कष्ट उस अनिष्ट शक्तिको हो रहा है, जो आपको कष्ट दे रही है और उसीका प्रकटीकरण उष्णताके और थकावटके रूपमें आपको होती है और उसकी शक्ति न्यून हो जानेपर आपको शांतिकी अनुभूति होती है । आपको अभी अधिकसे अधिक हनुमानजीकी ही साधना करनी चाहिए जब तक आपके कष्ट न्यून न हो जाएं | आपको कष्ट देनेवाली शक्ति शिवभक्त है; अतः जब आप शिवका मन्त्र करते हैं तो उसे अच्छा लगता है और आपको कष्ट नहीं होता ।
(विश्लेषण : ये साधक शिव मंत्रका जप अनेक वर्षोंसे कर रहे हैं और इन्हें अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट भी  है ।  जो अनिष्ट शक्ति इन्हें कष्ट दे रही हैं वह भी एक शिव भक्त है और उसे इन साधकसे सद्गतिकी अपेक्षा है । उस अनिष्ट शक्तिको हनुमानजीके जपसे कष्ट होता है;  अतः मैंने उन्हें हनुमानजीका जप करनेके लिए कहा था ।)
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 हमने आपके लेखमें पढा है कि एक साधक जब हनुमानजीका जप करते थे तो उन्हें कष्ट होता था । थोडे समय पश्चात् उनका कष्ट न्यून हो जाता था; परन्तु शिवजीका जप करनेसे कष्ट नहीं होता था । मेरा प्रश्न यह है कि हनुमानजी तो साक्षात रुद्रके ११वें अवतार हैं तो उनके भक्तको अनिष्ट शक्ति कैसे कष्ट दे सकती है ?  –  विजय ताम्बे, मुंबई
उत्तर :  कष्ट साधकको नहीं,  उस अनिष्ट शक्तिको हो रहा था और और उसका प्रकटीकरण (manifestation)  उस साधकको कष्टके रूपमें हो रहा था, चूंकि वह अनिष्ट शक्ति शिव-भक्त रही है और हनुमानके नामजपके स्पंदनसे उसकी शक्ति तीव्रतासे नष्ट हो रही थी और उसे कष्ट हो रहा था ।  उस साधकको अनेक वर्षोंसे कष्ट दे रही थी;  अतः हनुमानजीका जप करनेसे उसे उस साधकको छोडकर जाना पडेगा और वह साधक जप न कर पाए,  इसलिए उसे कष्ट दे रही थी और थोडे समय पश्चात् उसकी शक्ति घट जाती थी;  अतः वे कष्ट देना बंद कर देती थी ।
आपका कहना उचित है कि हनुमानजी रुद्रके ११वें अवतार हैं; परन्तु वर्तमान कालमें साधना करना एक धर्मयुद्ध करने समान है और अध्यात्म सूक्ष्मतम शास्त्र है । वर्तमान समयमें आसुरी शक्ति अपना साम्राज्य स्थापित करने हेतु प्रयत्नशील है । इस धर्मयुद्धमें अनिष्ट शक्तियां  भक्तोंको अधिक कष्ट दे रही हैं और उसके लिए वे साधककी साधनाकी काट ढूंढ, उसे कष्ट देती हैं; अतः उस अनिष्ट शक्तिको किस नामजपके स्पंदनसे कष्ट हो सकता है, यह ज्ञात हो जाए तो उस अनिष्ट शक्तिपर विजय पाना सरल हो जाता है ।  सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट (आसुरी) शक्तियांसे पीडित साधकोंपर नामजपके माध्यमसे उपचार करते समय मैंने पाया है कि किसी विशिष्ट कष्टको दूर करने हेतु  जब कोई जप बताया जाता है तो अनेक बार ऐसा वे (अनिष्ट शक्तियां) कुछ समयमें ही उस नामजपका काट ढूंढ लेती हैं या स्वयं जपका उसे सिद्ध कर लेती हैं ऐसेमें पुनः उस साधकको जप परिवर्तित करना पडता है |
आपको बता दें, देवासुर संग्राममें उल्लेख किया गया है कि असुर भी शिवभक्त हुआ करते हैं और देवता एवं असुरमें जिसकी भक्ति श्रेष्ठ होती थी वह धर्मयुद्धमें जीतता था । जब असुर देवताको कष्ट दे सकते हैं तो हम क्या हैं, स्वयं सोचें ! ध्यान रहे,  हमसे अधिक एकाग्रतासे और दृढतासे आसुरी शक्ति हमें धर्मके मार्गसे विमुख करनेके लिए साधनाकर, हमें कष्ट देती हैं । ऐसेमें हमें भी सूक्ष्म युद्धकी रणनीति सीख, उन्हें पराजित करना आना चाहिए । इस साधकको शिवजीके जपसे कष्ट इसलिए नहीं हो रहा था; क्योंकि उस जपके स्पंदनसे उस अनिष्टके जपका स्पंदन मेल खाता था । वह सरलतासे साधकद्वारा अर्जित शक्तिको अपने पिण्डमें खींच लेती थी । देवी-देवताके प्रत्येक नामके साथ विशेष प्रकारके रूप, रस, गंध, स्पर्श एवं शक्ति जुडी होती है । जैसे शक्ति तत्त्वके कई स्वरूप हैं । अम्बा, काली, सरस्वती, भवानी; परन्तु सभीके कार्य और तत्त्व भिन्न हैं । यह हिन्दू धर्मकी विशेषता है कि अध्यात्मके सूक्ष्मतम पक्षपर सतत् संतों एवं ऋषियोंने शोधकर, मानव जातिको आसुरी शक्तिसे संरक्षण हेतु उपाय बताएं हैं और साथ ही शीघ्र आध्यात्मिक प्रगतिके साधन भी ।- तनुजा ठाकुर

 



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