मैं पिछले एक माहसे एक दोषको न्यून हेतु स्वयंसूचना दे रहा हूं; किन्तु उसकी तीव्रता न्यून नहीं हो रही है ऐसेमें मुझे क्या करना चाहिए एवं मेरे दोष न्यून क्यों नहीं हो रहे हैं ? - यशपाल शर्मा, देहली


सर्वप्रथम यह जान लें कि दोषकी तीव्रता न्यून हो, इस हेतु निम्नलिखित सर्व प्रयास होने आवश्यक हैं –
१. चूकोंको स्वभावदोष सारिणीमें योग्य कृत्य, विचार या वृत्तिके साथ लिखना आवश्यक होता है । यदि आप मात्र चूक लिखते हैं एवं उससे सम्बन्धित सूचना नहीं देते हैं तो आपके दोष शीघ्र दूर नहीं हो सकते हैं ।
२. दोष न्यून हो इस हेतु प्रसंग लिखकर, योग्य स्वयंसूचना बनाकर देनी चाहिए । जैसे जब-जब मुझे क्रोध आएगा, तब-तब मुझे भान होगा कि क्रोध करना मेरा दोष है और मैं शान्त हो जाऊंगा । ऐसी स्वयंसूचनासे दोषोंकी तीव्रता घटनेमें कोई लाभ नहीं होता है । इसलिए स्वयंसूचना अच्छेसे प्रसंग अनुसार एवं आपके मनको जो सहज स्वीकार हो वह देना चाहिए । जैसे जब-जब मैं अपनी पत्नीपर कार्यालय हेतु जानेके समय देरीसे भोजन बनाते हुए देखुंगा और उसपर क्रोध करूंगा तब-तब मुझे भान होगा कि प्रातः उसके पास भी बहुत कार्य रहता है; इसलिए उसपर क्रोध करनेके स्थानपर मैं बच्चोंको विद्यालय जाने हेतु सज्ज (तैयार) करनेमें सहायता करूंगा !
३. स्वयंसूचना देनेकी पद्धति भी योग्य होनी चाहिए अर्थात स्वयंसूचना देते समय मनका शान्त व स्थिर होना आवश्यक होता है । इस हेतु एक शान्त स्थानमें सुखासनमें बैठकर कुछ क्षण नामजप करके मनको एकाग्र करना चाहिए, उसके पश्चात एक स्वयंसूचनाको पांच बार देना चाहिए । हम ऐसे पांच सत्र सम्पूर्ण दिवस कर सकते हैं । एक सत्रमें तीन दोष ले सकते हैं अर्थात एक दोष हेतु पांच बार स्वयंसूचना दोहराना है एवं इस प्रकार एक सत्रमें पन्द्रह स्वयंसूचना होनी चाहिए ।
४. जिन दोषोंसे सम्बन्धित हम सत्रकर रहे हैं उनके सम्बन्धमें स्वभावदोष सारिणीमें जो भी प्रगति अनुभव होता हो वह लिखना चाहिए । जैसे आज पत्नीपर क्रोध तो किया; किन्तु दो मिनिटमें ही उसे नियन्त्रितकर लिया । कार्यालयमें एक कर्मचारीकी अकर्मण्यतापर क्रोध आया; किन्तु व्यक्त नहीं किया । इस प्रकार जिन दोषोंके विषयमें हम स्वयंसूचना दे रहे हैं, उनके विषयमें प्रगति क्या हुई वह नित्य भरना चाहिए ।
५. स्वयंसूचना देते समय यदि हम प्रार्थना करें तो हमें और अधिक लाभ होता है । जैसे हे प्रभु, (अपने गुरुदेव या इष्ट देवताका नाम ले सकते हैं) अभी मैं दोष निर्मूलन हेतु स्वयंसूचना देने जा रहा हूं, इसे मैं निर्विघ्नकर सकूं इस हेतु आप मेरे चारों ओर अपने अस्त्र और शस्त्रसे अभेद्य सुरक्षा कवच निर्माण करें एवं मैं जो स्वयंसूचना देने जा रहा हूं, वह एक शस्त्र समान मेरे अन्तर्मनमें जाकर दोषोंको न्यून करनेमें सहायक हो, ऐसी आप कृपा करें और हमसे यह प्रक्रिया गम्भीरतासे एवं सातत्यसे होने दें !
६. हमारे दोष हमारे अनेक जन्मोंके संस्कारोंका ही परिणाम हैं; इसलिए वे त्वरित दूर नहीं होंगे; अतः हमें उन्हें दूर करने हेतु सातत्यसे व उत्साहसे प्रयास करना चाहिए । दोष न्यून होनेसे हम ईश्वरके निकट जा सकते हैं, यह भाव रखकर उसे दूर करने हेतु प्रयत्नशील होना चाहिए !
७. एक स्वयंसूचनाको दो सप्ताहसे अधिक नहीं देना चाहिए; क्योंकि मन उसी सूचनाको स्वीकार नहीं करता है; अतः कोई दूसरा दोष एक सप्ताह या एक पक्ष लेकर पुनः पूर्ववाले दोषको लेना चाहिए ।
उपरोक्त बताए सर्व तथ्योंको ध्यानमें रखनेसे एवं योग्य कृत्य करनेसे हमारे दोष अवश्य ही न्यून होते हैं !


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