श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – ३)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेख श्रृंखलामें मैं प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी –
अगस्त १९९७ में एक दिवस मैं श्रीगुरुके ध्वनिमुद्रित(रिकार्डेड) सत्संग सुन रही थी । उसमें उन्होंने बताया कि अध्यात्ममें २ प्रतिशत ज्ञान शब्दोंके माध्यम एवं ९८ प्रतिशत ज्ञान शब्दातीत माध्यमसे प्राप्त होता है, उनके मुखारविंदसे इस उद्गारको सुनकर यह तो स्पष्ट हो गया था कि उन्हें ९८ प्रतिशत सूक्ष्मका ज्ञान है ।
सितम्बर १९९० में एक घटनाके पश्चात् अकस्मात मेरी सूक्ष्म इन्द्रियां कार्यरत हो गईं थीं । यह कैसे हुआ इसका उल्लेख मैं यहां इसलिए नहीं कर रही हूं; क्योंकि मैंने गुरु संस्मरणकी लेख श्रृंखलामें इस सम्बन्धमें विस्तारसे बता चुकी हूं । इसके पश्चात् मेरे मनमें सूक्ष्म जगतसे सम्बन्धित अनेक प्रश्न उभरने लगे, अपनी जिज्ञासाकी पूर्ति हेतु ध्यानकी साधनाके साथ ही कुछ सन्तोंके ग्रन्थोंका अभ्यास भी करने लगी थी ।
श्रीगुरुके ये अमृतवचन सुनकर, मुझसे आर्ततासे एक उत्स्फूर्त प्रार्थना हुई और उस दिवसके इस प्रसंगको मैं कभी भूल ही नहीं सकती । मुझसे जो प्रार्थना हुई वह इसप्रकार थी “हे परम पूज्य गुरुदेव, अध्यात्मका २ प्रतिशत ज्ञान देनेवाले गुरु तो मुझे इस ब्रहमाण्डमें बहुत मिल जायेंगे; किन्तु मुझे उससे अधिक सूक्ष्म ज्ञान पानेकी उत्कंठा है; अतः मैं आपके शरणागत होकर उस सूक्ष्म ज्ञानको पानेकी अभिलाषा रखती हूं ।” उसी क्षण सूक्ष्मसे ईश्वरसे एक सन्देश आया. “जिस ज्ञानको पाने हेतु तुम अपने श्रीगुरुसे प्रार्थना कर रही हो, उसे पाने हेतु कठोर साधना एवं मृत्युतुल्य कष्ट सहन करने पडेंगे ।” मैं बाल्यकालसे ही ईश्वरसे बातें किया करती थी; अतः इसप्रकारके सन्देशके आनेसे मुझे किंचित मात्र भी आश्चर्य नहीं हुआ । मैंने ईश्वरसे विनम्रतासे निवेदन किया, “यदि आप मुझे सूक्ष्म सम्बन्धी ज्ञान पानेका पात्र समझते हैं तो मुझे मेरे श्रीगुरुके माध्यमसे इसे देनेकी कृपा करें, मैं आपको वचन देती हूं कि आपके निर्देश अनुसार मैं साधना करूंगी चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो और मृत्यु तुल्य कष्ट सहन करनेसे भी मैं भयभीत नहीं हूं, यदि आपकी कृपा हुई तो मैं इसे भी आनन्दपूर्वक सहन कर लुंगी ।” तभी ईश्वरका पुनः सन्देश आया “मृत्युतुल्य कष्ट एक बार नहीं अपितु इस मार्गपर चलते समय पग-पगपर आयेंगे, क्या तुम उसे सहन कर पाओगी ?” मैंने ईश्वरसे  कहा, “सूक्ष्म सम्बन्धी ज्ञानार्जन हेतु सबकुछ सहन करने हेतु मैं तत्पर हूं ।” उसके पश्चात् कुछ दिवस मुझसे सहज ही श्रीगुरुसे सूक्ष्म ज्ञान हेतु सातत्यसे प्रार्थना होती रही ।
इस प्रार्थनाके कुछ ही दिवस पश्चातसे ही मेरे परीक्षा भी आरम्भ हो गई । ज्ञान पाने हेतु परीक्षामें उत्तीर्ण तो होना ही पडता है; अतः मुझे समझमें आ गया कि मेरी प्रार्थना, ईश्वर चरणों तक पहुंच चुकी है । तबसे मुझे इतने भिन्न प्रकारके असह्य कष्ट हुए हैं और आज भी हो रहे हैं, जिसे शब्दबद्ध करना सम्भव नहीं; किन्तु गुरुकृपाके कारण मैं उसे सहन करती आई हूं ।
मुझे ९८ % सूक्ष्मका ज्ञान हुआ है या नहीं यह तो वही बता सकते हैं जिन्हें यह ज्ञान है; किन्तु यह अवश्य है कि मैं आज तृप्त हूं, अब जीवनमें कुछ प्राप्त करनेकी इच्छा शेष नहीं है ।
स्थूल और सूक्ष्मकी ज्ञानकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले मेरे श्रीगुरुके प्रति मैं शब्दमें कभी भी कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर सकती हूं; किन्तु यह अवश्य कह सकती हूं शिष्य, यदि गुरुकी इच्छा अनुरूप वर्तन करे तो सर्वज्ञ सद्गुरु, शिष्यकी बिना बोले उसकी सभी इच्छाओंको पूर्ण करते हैं । आपको बता दें, मुझ अभागनको मेरे श्रीगुरुका स्थूल सान्निध्य अत्यधिक कम प्रमाणमें मिला और न ही मैंने कभी अपनी कोई इच्छा उन्हें बोलकर व्यक्त की है; किन्तु शिवस्वरूपी मेरे श्रीगुरुने मेरी सर्व इच्छाओंकी पूर्ति कर मुझे सदैव ही निहाल करते आए हैं । – तनुजा ठाकुर



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution