श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – ५)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेख श्रृंखलामें मैं प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी…….
मई १९९७ में श्रीगुरुने प्रथम साक्षात्कारके समय ही मुझे सत्संग लेनेके निर्देश दिए । गुरु आज्ञा पालन हेतु मैंने सत्संग लेने आरम्भ किए और समाजको धर्म शिक्षण देने हेतु मेरे श्रीगुरुद्वारा संकलित ग्रन्थोंके अभ्यास एवं मनन चिंतन करना भी आरम्भ किया । मैंने उनके ग्रंथोंमें बताये हुए तत्त्वोंको अपने जीवनमें उतारना आरम्भ किया एवं उससे दिव्य आनन्दकी अनुभूति होने लगी । (एक खरा प्रसारक समाजको बतानेवाले तत्त्वोंको पहले अपने जीवनमें उतारता है ।)
आनन्द किसे कहते हैं, उस विषयमें मेरे श्रीगुरुने लिखा है कि सुख एवं दुःखके परेकी स्थितिको आनन्द कहते हैं और साधनाके आरम्भिक कालमें मुझपर दु:खोंका जैसे पहाड टूट पडा; किन्तु आश्चर्य इस बातकी थी कि मुझे उन दुखोंकी आंच तक नहीं लगती थी । अत्यन्त विपरीत परिस्थितिमें भी मैं इतनी आनंदमें रहती थी कि अनेक बार लोग मुझे देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे; क्योंकि मेरे मुखपर या मेरे शब्दोंमें अंशमात्र भी दुःखकी झलक दिखाई नहीं देती थी । आपको बता दें कि विपरीत परिस्थितियोंमें भी आनन्दी रहनेके कारण मुझे, मेरे कुछ ‘शुभचिंतकों’ने विक्षिप्तकी (पागलकी) भी उपमासे अलंकृत किया है । श्रीगुरुसे साक्षात्कारके मात्र डेढ वर्षोंमें आनन्दकी इस परिभाषाकी अनुभूति लेनेके पश्चात् मैंने सम्पूर्ण मानव जातिको आनन्दकी यह अनुभूति बताने हेतु भी, मैं अपने श्रीगुरुके प्रति शरणागत हुई ।
आज भी सातत्यसे हुए सूक्ष्म जगतकी अनिष्ट शक्तियोंके आघात एवं अपनी शारीरिक क्षमतासे कई गुना अधिक श्रम करनेके कारण सामान्य व्यक्ति समान मैं चल-फिर नहीं सकती हूं, बोल नहीं सकती, भोजन ग्रहण कर, पचा नहीं सकती हूं एवं यह स्थिति अनेक वर्षोंसे है; तथापि मेरे मुखको देखकर यह कोई नहीं कह सकता है कि मुझे इतना अधिक कष्ट है । जब मैं वायुयानस्थलपर (हवाई अड्डेपर) व्हीलचेयर लेती हूं तो कुछ लोग सहज ही कहते हैं कि आपको देखकर तो कहींसे नहीं लगता कि आप ५०० मीटर नहीं चल सकती हैं ?, इसीप्रकार अनेक बार तो मुझे इतना कष्ट है; तब भी आनंदी कैसे रहती हूं, यह चिकित्सकोंको भी समझमें नहीं आता है । मुझे लगता है कि ऐसे अखण्ड आनंदकी अनुभूति देनेवाले मेरे श्रीगुरुके प्रति मेरी कृतज्ञता तभी व्यक्त होगी जब मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें इस आनन्दकी अनुभूतिके गूढ तत्त्वका प्रसार कर पाऊंगी; अतः अब मैं धर्मप्रसारकी सेवा मात्र अपने श्रीगुरुको कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु करती हूं । – तनुजा ठाकुर (२५.९.२०१७)



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