श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – २)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेखमें मैं  प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी –
विद्यार्थी जीवनमें मुझे सभी विषयोंमें ९८, ९९, या १०० अंक मिला करते थे; इस कारण प्रधानाध्यापक एवं  सभी विषयोंके शिक्षक मुझसे अत्यधिक स्नेह करते थे | अनेक बार वे सब मुझे बुलाकर पूछते थे कि मैं भविष्यमें क्या बनना चाहती हूं, सभी शिक्षकोंका आग्रह होता था कि मैं उनके विषयमें अच्छी हूं; अतः उनके विषयसे सम्बन्धित ही कोई क्षेत्र लूं | वे सब अपने-अपने विषयकी अच्छाई मुझे बतानेके क्रममें आपसमें तर्क करने लगते थे | मेरी हिंदीकी शिक्षिका चाहती थीं कि मैं एक लेखिका या हिंदीकी व्याख्याता बनूं, मेरी जीव-विज्ञानकी शिक्षिका चाहती थीं कि मैं चिकित्सक बनूं, वहीं मेरी इतिहासकी शिक्षिका चाहती थीं कि पुरातत्त्व विभागमें शोधकर्ता बनूं और मेरे विज्ञान एवं गणितके शिक्षिक तो मुझे नासा जाने हेतु प्रेरित करते रहते थे उन्हें लगता था कि मुझमें शोध करनेकी वृत्ति है अतः मेरे लिए वही उपयुक्त स्थान है | इसप्रकार सभी शिक्षक मुझे किसी न किसी क्षेत्रमें जाने हेतु प्रेरित करते रहते थे |
मैं सभीका सम्मान करती थी; किसीके हदयको व्यथित नहीं करना चाहती थी; अतः मौन होकर उनकी मीठी लडाई, जिसके लिए मैं कारणीभूत होती थी, देखकर, अपनी कक्षामें लजाकर भाग आती थी | यह एक बार नहीं अपितु अनेक बार हो चुका था |
मेरा यह पूर्ण विश्वास है कि यह उनके स्नेह और आशीर्वादका ही परिणाम है मुझे बिना कोई विशेष प्रयत्नके अल्पायुमें ही मेरे श्रीगुरु जैसे परात्पर स्तरके मार्गदर्शक  मिले | मैं सभी साधक वृत्तिवाले व्यक्तियोंसे यह कहना चाहूंगी कि जीवनमें यशस्वी होने हेतु अपने आचार्य एवं माता-पिताका आशीर्वादका होना, अति आवश्यक होता है, जिनके पास यह आशीर्वाद होता है, उसके लिए इस ब्रह्माण्डमें कुछ भी असाध्य नहीं होता |
ज्ञानप्राप्तिमें रुचि तो थी ही उसके साथ ही मुझे उत्तम शिक्षक एवं ऐसे माता-पिता मिले जिन्होंने मेरे ज्ञानार्जनमें सदैव ही मेरी अत्यधिक सहायता की | हमारे पिताजी सदैव ही हमें अच्छे साहित्य लाकर पढने हेतु देते थे एवं मेरी माताजी हमें अध्यात्म एवं व्यावहारिक शिक्षा अपने मुखारविंदसे या प्रत्यक्ष कृति कर सिखाती रहीं |
युवावस्था आते-आते मेरे मनमें अनके विषयोंमें मैं ज्ञानार्जन करूं, यह वृत्ति निर्माण हो चुकी थी | अपनी अल्प बुद्धिसे मैंने यह निश्चय किया था कि मैं किसी भी क्षेत्रमें जाऊं; किन्तु अपनी ज्ञानार्जनकी प्रक्रियामें निरंतरता बनाए रखुंगी एवं इस हेतु अनेक विषयोंमें कमसे कम स्नातकोत्तर तककी शिक्षा अवश्य ग्रहण करती रहूंगी |
जून १९९७ की बात है | मुझे सनातन संस्थासे  जुडे, एक माह ही हुए होंगे कि एक दिवस जब मैं साप्ताहिक सत्संगमें गयी तो हमारी सत्संग सेविका अध्यात्मशास्त्र एवं आधुनिक विज्ञानमें क्या भेद है, यह विषय हमारे श्रीगुरुद्वारा संकलित ग्रन्थ ‘अध्यात्मका प्रस्तावानात्मक विवेचन’से ले रही थीं | उस दिवस वे बता रही थीं कि सभी विषयोंका उद्गम अध्यात्मसे होनेके कारण जिसे अध्यात्मका पूर्ण ज्ञान हो जाता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है | मुझे उनकी वह बात बहुत अच्छी लगी | मैंने घरमें आकर उस ग्रन्थमें उल्लेखित उस विषयका पुनः अभ्यास किया और अर्थशास्त्रमें स्नातकोत्तरकी मेरी सारी पुस्तकें एवं अन्य ढेरों पुस्तकें ले जाकर कबाडीको अगले दिवस विक्रय कर दी; क्योंकि मुझे उन विषयोंके अभ्यासमें अब कोई औचित्य दिखाई नहीं दे रहा था | मैं निश्चय कर चुकी थी कि अब सभी विषयोंके जन्मदाता अध्यात्मशास्त्रका ही मात्र अभ्यास करना है; क्योंकि मुझे भान हो चुका था कि मेरी जीवात्मा सर्वज्ञताकी अनुभूति हेतु अनेक जन्मोंसे तडप रही थी, जिसे मैं मायाकी शास्त्रोंका अभ्यास कर तृप्त करनेका निरर्थक प्रयास कर रही थी |
मैंने अपने  पिताजीको मुंबईसे बिहारमें दूरभाष कर कहा कि मैंने आगेकी पढाई नहीं करनेका निर्णय लिया है | वे आश्चर्यचकित हो गए; क्योंकि उन्हें पता था कि पढाईके अतिरिक्त मुझे अन्य किसी भी क्षेत्र या वस्तुमें रुचि नहीं है, उनके अनुसार विद्यार्जनमें मेरे प्राण बसते थे | उन्होंने कहा “जिस ग्रन्थको पढकर मेरी पुत्रीने अपनी उच्च शिक्षाको  मध्यमें छोडनेका निर्णय लिया है, उस ग्रन्थके रचियता कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हो सकता, वे निश्चित ही कोई महापुरुष हैं |  उन्हें मेरा नमस्कार कहना और मुझे आपके निर्णयपर गर्व है और मेरा आशीर्वाद आपके साथ है | ऐसे दिव्य पुरुषका सान्निध्य इस अल्पायुमें  पाकर आपका जीवन धन्य हो गया  |”
और आज इतने वर्ष पश्चात् मुझे मेरे निर्णयपर आनंद होता है, मैं सर्वज्ञ तो नहीं; किन्तु तृप्त  अवश्य हूं और आनंदमें भी रहती हूं | अखण्ड आनंदकी अनुभूति देकर एवं अध्यात्मका स्थूल एवं सूक्ष्मका ज्ञान देकर, मेरी आत्माको संतुष्टि प्रदान करनेवाले, मेरे परब्रह्म स्वरूपी श्रीगुरुके प्रति, मैं हृदयसे कृतज्ञता व्यक्त करती हूं | – तनुजा ठाकुर (२२.९.२०१७)



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