श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – ८)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेख श्रृंखलामें मैं प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी…..
मेरे मनमें बाल्याकालसे अन्याय एवं अनुचित आचरणको देखकर आक्रोश उत्पन्न हो जाया करता था | दुराचारी, व्याभिचारी एवं भ्रष्टाचारीको ईश्वर दण्ड क्यों नहीं देते हैं यह प्रश्न निर्माण हुआ करता था | शिक्षण क्षेत्रमें हुए भ्रष्टाचारके जब मैं स्वयं ग्रास बनी तो मेरा आक्रोश ऐसे लोगोंको प्रति और बढ गया और उन्हें दण्ड मिलना ही चाहिए, यह इच्छा बलवती हो गई | इस कारण मैंने अपने जीवनका मुख्य ध्येय ऐसे लोगोंको दण्ड दिलवाना एवं सुराज्यकी स्थापना करनेका अपने संकल्पके विषयमें आपको बता ही चुकी हूं; किन्तु यह कैसे साध्य होगा इसपर मेरा गहन चिंतन भी चल ही रहा था कि तभी मेरा श्रीगुरुसे मुंबईमें साक्षात्कार हुआ |
वे ईश्वरीय राज्यकी स्थापनाका विषय अपने सार्वजानिक सत्संगमें महाराष्ट्रमें भिन्न स्थानोंपर ले रहे थे | एक दिवस उनके इसी विषयपर मुझे एक ध्वनिमुद्रित सत्संग सुनने हेतु मिला जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि ईश्वर मात्र एक भक्तके लिए भी अवतार धारण कर दुर्जनोंको दंड दे सकते हैं और इतिहासमें इसके अनेक उदहारण हैं |
मैंने अपने श्रीगुरुके छायाचित्रके समक्ष उनसे प्रार्थना की, “आप मेरे जीवनका उद्देश्य जानते ही हैं और मैं आपके इस अमृतवचन अनुसार ऐसे भक्त बननेका प्रयास करना चाहती हूं जिसकारण ईश्वर अवतार धारण कर नराधमोंको दण्ड दें और इस वसुंधराके भारको हलका करें | मुझे आशीर्वाद मैं ऐसी भक्त बन सकूं, इस हेतु आपको जो अपेक्षित है वैसी  साधना करनेका मैं अवश्य ही प्रयास करूंगी |”
पिछले बीस वर्षोंसे मैंने अपने श्रीगुरुको दिए इस वचनका पालन हेतु ईश्वरको साक्षी मानकर अखंड साधनारत हूं और मुझे पूर्ण विश्वास है कि योग्य काल आते ही महाकाल निश्चित ही धराधामपर पधारकर, इस पृथ्वीको नराधमोंसे मुक्त कर सुराज्यकी स्थापना करेंगे |  – तनुजा ठाकुर(२८.०९.२०१७)

 



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