श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – १०)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेख श्रृंखलामें मैं प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी…..
हमने आपको बताया ही था कि हमारे श्रीगुरुका उद्देश्य समाजमें सुराज्यकी स्थापना अर्थात् रामराज्यकी स्थापना करना है; किन्तु इसके साथ ही वे सभीके अन्दर भी रामराज्य ला रहे हैं ।  साधकोंके आसुरी वृत्तियोंका नाश हो एवं  उनके मनमें रामजीका राज हो अर्थात् दैवीय गुण विद्यामान हों, इस हेतु साधकोंके दोष निर्मूलन एवं अहं निर्मूलनकी प्रक्रिया हेतु सभीके समक्ष साधकोंकी चूकें बताई जाती हैं, उन्हें यह प्रक्रिया चरण-दर-चरण सिखाई जाती है ।  (यह प्रक्रिया आज ‘उपासना’में की जाती है । ) इतना ही नहीं साधकका घर भी आश्रम समान चैतन्यमय बनें अर्थात् वहां भी रामराज्य निर्माण हो इस हेतु भी योग्य दिशा-निर्देश दिए जाते रहे हैं ।  हमारे अन्दर-बाहर अर्थात् इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डमें रामराज्य निर्माण करनेमें हमारे ‘रामस्वरूपी अवतारी श्रीगुरु’ पूर्णत: समर्थ हैं; इसपर मेरा दृढ विश्वास है; तथापि जिसप्रकार प्रभु श्रीरामने रावणसे युद्ध हेतु वानर, रीछ और एक निर्बल गिलहरीको भी अपने उद्धार हेतु संधि दी, उसीप्रकार अपने उद्धार हेतु श्रीगुरुके रामराज्यके स्थापनाके कार्यमें यह अबला अपना निकृष्ट योगदान देने हेतु उनके प्रति शरणागत हुई ।  – तनुजा ठाकुर (३०.९.२०१७)



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