श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – ७)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेख श्रृंखलामें मैं प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी…….
जब मैं युवावस्थामें प्रवेश करने लगी तो सभी पिता समान, मेरे पिताजी भी मेरे विवाहकी चर्चा घरमें किया करते थे तो मैं उन्हें झटसे कहती थी कि मुझे विवाह नहीं करना, जन्म लो, जन्म दो और मर जाओ, यह मेरे जीवनका उद्देश्य नहीं है | तो वे मुझे समझाते हुए कहते, “बेटा ऐसा नहीं कहते, आपकी माताजी, दादी, नानी, मौसी बुआ, सभीने विवाह किया है, आपने एक कुलीन मैथिली ब्राहमण परिवारमें जन्म लिया है, इसप्रकारकी बातें करना आपको शोभा नहीं देता | ” सभी पुत्रियों समान मैं भी अपनी पिताजीकी बहुत लाडली थी | सच कहें, तो मेरे व्यक्तित्वको संवारनेमें उनका बहुत बडा हाथ रहा है | मैंने उनसे अपनी विवशता व्यक्त करते हुए कहा करती थी, “मुझे ज्ञात है कि मेरा ऐसा कहना आपके मनको उद्विग्न करता है; किन्तु मैं क्या करूं, चाहकर भी उस दिशामें मेरी विचार प्रक्रिया नहीं हो पाती है, मुझे लगता है मैं कोई विशिष्ट कार्य करने हेतु आई हूं और मुझे वही करना है | सामान्य लोगों समान मुझे जीवन व्यतीत करनेकी इच्छा नहीं है | ” वे मुझसे प्रेमसे पूछते, “कौन सा विशिष्ट कार्य करना है आपको ?”  मैं उन्हें कहती, “यही तो मुझे ज्ञात नहीं है |” एक दिवस इसीप्रकारकी पुनः वार्तालापमें मेरे पिताजीने मुझे आश्वस्त करते हुए कहा, ठीक है, जिस दिवस आपको ज्ञात हो जाएगा कि आपने क्या करना है, आप मुझे बताएं यदि वह आपके हित हेतु होगा और हमारे संस्कारोंके अनुकूल हुए मैं यथासंभव उसमें आपकी सहायता करूंगा |
मई १९९७ में श्रीगुरुके साथ हुए प्रथम साक्षात्कारमें ही मुझे ज्ञात हो गया कि मेरा जन्म उनके कार्य निमित्त हुआ है और मेरे श्रीगुरुने मुझसे बिना अध्यात्म सम्बन्धी कुछ भी पूछे मुझे सत्संग लेनेका आदेश दिया ! उनसे मिलनेके कुछ दिवस पश्चात् मैंने अपने पिताजीको दूरभाष कर कहा, ” मुझे ज्ञात हो गया है कि मेरे जन्म क्यों हुआ है और मुझे करना है ?” मेरे पिताजी एक साधक वृत्तिके सदगृहस्थ थे | उन्हें मेरी यह बात सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ कि अकस्मात् इसके साथ क्या हो गया जिसकारण ये मुझसे यह सब कह रही है | उन्होंने मुझसे पूछा,. “क्या ज्ञात हो गया है और क्या करना है, आपने ?”  मैंने उनसे कहा, “मेरा जन्म मेरे श्रीगुरुके लिए हुआ है और मुझे उनका कार्य करना है, यही मेरे जीवनका उद्देश्य है और ये वही हैं जिन्हें मैं अभी तक ढूंढ रही थी |” मैंने श्रीगुरुसे हुए प्रथम भेंट सम्बन्धी अपनी अनुभूतियां बतायीं, उनके विषयमें एवं उनके साधकोंके विषयमें बताया, वे यह सब सुनकर बहुत आनंदित हुए |
एक वर्ष पश्चात् मैंने अपने माता-पितासे पूर्ण समय साधना करने हेतु आज्ञा मांगते हुए कहा, “मेरा मन संसारमें नहीं रमता, मुझे यह बन्धन कष्ट देता है, मुझे पूर्ण समय साधना करनेकी अनुमति दें | मैं इस हेतु अपनी मानसिक सिद्धता कर चुकी हूं | ” मेरे पिताजीने कहा, “बेटा, आपके प्रारब्धमें हस्तक्षेप कर, मुझे पापका भागी नहीं बनना है | आपका जन्म संभवत: इसीलिए हुआ है; आपकी दादीने आपके जन्मके कुछ क्षण पश्चात् ही आपके विषयमें यह भविष्यवाणी कर चुकी थीं | मेरा आशीर्वाद आपके साथ है |” मैं बहुत आश्चर्यचकित हुई” | मैंने कहा, “आपने इस विषयमें पहले कुछ बताया क्यों नहीं ? उन्होंने कहा, “मैंने सोचा यदि विधाताने आपके लिए यही निर्धारित किया होगा तो आप स्वतः ही उस मार्गकी ओर प्रवृत्त हो जायेंगी ? किन्तु यह जानते हुए भी मैंने आपको धर्म, साधना या अध्यात्मसे कभी दूर नहीं रखा | मैं विधिके इस विधानको स्वीकार कर, आपको इस मार्गमें जाने हेतु अनुमति देता हूं |”
मेरा जन्म मेरे श्रीगुरुके कार्य निमित्त हुआ है; अतः मैं मूल उद्देश्यकी प्राप्ति हेतु भी उनके प्रति शरणागत हुई |
वस्तुत: मुझे लगता है मैं, अपने परम पिता परमेश्वर स्वरुपी अपने श्रीगुरुकी एक रोबोट हूं | तभी तो ख्रिस्ताब्द १९९० में सनातन संस्थाकी स्थापना जब श्रीगुरुने की और उसी वर्ष परिस्थिति अनुरूप मुझसे भी समष्टि कार्य निमित्त उन्होंने मेरी कुलदेवीके समक्ष मुझसे संकल्प समष्टि कार्य निमित्त करवा कर ले लिया |
मुझमें और एक रोबोटमें मात्र यह भेद है कि रोबोट अपने रचियताके प्रति आभार व्यक्त नहीं कर सकता; किन्तु मैं अपने रचियताके प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकती हूं | मैं जीवनके अन्तिम क्षणों तक उनका कार्य, कृतज्ञताके भावसे उनकी इच्छा अनुरूप कर सकूं, यही मेरी एकमात्र इच्छा है और उनके श्रीचरणोंमें प्रार्थना भी | (२७.९.२०१७)



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