श्रीगुरुके प्रति शरणागत होनेके कारण (भाग – ६)


मैं अपने श्रीगुरुसे क्यों जुडी, यह कुछ लोग मुझसे पूछते रहते हैं, तो इस लेख श्रृंखलामें मैं प्रतिदिन आपको एक कारण बताऊंगी…….
मई १९९७ में मुम्बईमें सनातन संस्थासे जुडनेके पश्चात् जब मैंने श्रीगुरुद्वारा संकलित ग्रन्थोंका अभ्यास करना आरम्भ किया तो मुझे लगा कि यह ज्ञान तो अधिकांश हिन्दुओंको ज्ञात ही नहीं है और इसे ही सभीको सिखाना चाहिए | उस समय मैं कुछ समय(पार्ट टाइम) शिक्षिकाका भी कार्य करती थी | मुझे लगा मैं विज्ञान, गणित इत्यादि पढाकर अपना और सभीका समय व्यर्थ कर रही हूं, वस्तुत: यह तो अविद्या है; क्योंकि यह मायासे सम्बन्धित है | यदि ज्ञान ही देना है तो ब्रह्मविद्याका देना चाहिए; जिससे मेरा और इस संसारका कल्याण हो; अतः समाजको धर्मशिक्षा देने हेतु मैंने उस कार्यको छोड दिया और उस समयका सदुपयोग अपने श्रीगुरुद्वारा संकलित ग्रन्थोंका जो अधिकांशत: मराठीमें थे और मराठी सनातन प्रभातका प्रसार करने लगी | अनेक मराठी भाषिक मराठी ग्रन्थ उठाकर मुझे उसके विषयमें हिन्दीमें बताते हुए सुनकर व्यंग्य करते हुए पूछते थे “आपको मराठी आती है क्या, आपने इन्हें पढा है क्या ?” मैं उन्हें अपनी विवशता बताते हुए कहती थी, “मैं आपके समान भाग्यशाली नहीं; क्योंकि मुझे मराठी नहीं आती है; अतः मैं इसे नहीं पढ सकती; किन्तु आप तो इसे पढ सकते हैं; अतः इसका वाचन कर देखें , यह निश्चित ही आपके जीवनको परिवर्तित कर देगा |” यह सुनकर कुछ लोग ग्रन्थ ले लेते थे तो कुछ लोग व्यंग्यात्मक रूपसे मुस्कुरा चले जाते थे; किन्तु भाषाका न जानना, मेरे लिए कभी अडचन नहीं बनी, मैं रेलवे स्थानक, बस स्थानक या जहां भी भीड हो, वहां ग्रन्थ प्रदर्शनी लगाकर लोगोंके मध्य धर्मप्रसार करती और सनातन प्रभातके मराठी संस्करणका वितरण भी करती | इसमें मुझे अभूतपूर्व आनन्दकी अनुभूति होने लगी | मैं जैसे एक भिन्न दिव्यलोकमें रहने लगी थी | बाह्य जगतका मुझे भान ही नहीं रहता था | इससे मुझे ज्ञात हुआ कि ब्रह्मविद्याका प्रसार आनन्द देता है और मैं अपने श्रीगुरुके वैशिष्ट्यपूर्ण लेखन, धर्मकी सटीक जानकारी, आधुनिक वैज्ञानिक भाषामें अध्यात्मके प्रस्तुतीकरणसे अत्यधिक प्रभावित थी | मुझे लगता था कि इसका प्रसार सम्पूर्ण विश्वमें होना चाहिए | मेरे अंतर्यामी श्रीगुरुने पुनः मेरे इस मनोभावको मेरे बिना बताए जान लिया और जून २००० में एक दिवस जब मैंने उन्हें अयोध्यामें धर्मप्रसारकी सेवा करते समय दूरभाष किया तो उन्होंने कहा, “आपमें तीव्र उत्कंठा है न, कि सभीको धर्मका ज्ञान हो तो आजसे आप अपने समान सदैव बांध कर ही रखियेगा, पता नहीं आपको कब, कहां प्रसार हेतु जाना पडे |” श्रीगुरुके आज्ञा अनुरूप, धर्मप्रसार हेतु मेरा एक बस्ता(बैग) आज भी तैयार रहता है |
मेरे परब्रह्म स्वरूपी श्रीगुरुने मात्र मेरी धर्मशिक्षणकी उत्कंठाको ही नहीं जाना, अपितु उन्होंने मुझे उनके ज्ञानका सम्पूर्ण विश्वमें प्रसार करनेकी संधि दी | इस हेतु उन्होंने मेरी आध्यात्मिक क्षमताको बढाकर उपासनाके माध्यमसे मुझे स्वतन्त्ररूपसे कार्य करनेकी संधि ही नहीं दी अपितु इस निमित्त आवश्यक शक्ति, ज्ञान और आशीर्वाद भी दिए | इसप्रकार श्रीगुरुद्वारा संकलित ग्रन्थ, जिसे अनेक सन्तोंने कलियुगका वेद कहा है, उसका प्रसार कृतज्ञताके भावसे करने हेतु भी मैं अपने श्रीगुरुके प्रति शरणागत हुई | (२६.९.२०१७)



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution