जो वस्तु जितनी अधिक सूक्ष्म होती है, उसमें क्षमता भी उतनी ही अधिक होती है ! जैसे बौद्धिक क्षमता सूक्ष्म होनेके कारण वह वृद्धावस्थामें भी साथ देती है; किन्तु शरीर स्थूल होनेके कारण उसकी क्षमता वृद्धावस्था आनेपर घट जाती है या नहींके समान रह जाती है ! इस सुवचनकी पुष्टि निम्नलिखित शास्त्रवचन करता है :
विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य द्वे विद्ये प्रतिपत्तये ।
आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितियाद्रियते सदा ॥
अर्थ : शस्त्र-विद्या एवं शास्त्र-विद्या अर्थात ज्ञानार्जन, दोनों ही मनुष्यको सम्मान दिलवाती हैं; किन्तु वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर इनमेंसे प्रथम अर्थात शस्त्र-विद्या, उसे उपहासका पात्र बना देती है, जब उस विद्याका प्रदर्शन करनेकी उसकी शारीरिक क्षमता समाप्तप्राय हो जाती है; किन्तु शास्त्र-ज्ञान सदा ही उसे आदरका पात्र बनाए रखता है ।
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