शासकीय ‘पेट्रोलियम’ उद्योगने एक वर्षमें ६८ सहस्त्र कोटि अर्जित किए, शासनके पास निजी उद्योगका कोई विवरण नहीं !


जुलाई २४, २०१८

तेल और गैस विक्रय कर शासकीय और निजी भूतेल-(पेट्रोलियम) उद्योग समृद्ध हो रहे हैं । जीएसटीसे ‘पेट्रो’ उत्पादोंको बाहर रखनेके निर्णयसे जहां उद्योगोंकी चान्दी हो रही है, वहीं साधारण नागरिक परेशान हैं । केन्द्रीय उत्पाद शुल्क सहित राज्योंके स्तरसे भी भिन्न-भिन्न दरपर कर लगानेसे पेट्रोलियम पदार्थोंकी महंगाई ऊंचाईपर है । एक जुलाईको दिल्लीमें पेट्रोल और डीजलपर दृष्टि डालें तो इस दिवससे जहां पेट्रोलका मूल्य ७५.५५ रुपये तो डीजलका मूल्य ६७.३८ रुपये प्रभावी है । करकी गणना करें तो इसमें पेट्रोल और डीजलपर जहां केंद्रीय उत्पाद शुल्क क्रमशः १९.४८ और १५.३३ रुपये लीटर तो राज्य शासन २७ और १७.२६ रुपये ‘वैट’ आदि कर ले रही है ।

उधर, एक बार फिर संसदमें हुए प्रश्नपर पेट्रोलियम मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधानने बता दिया है कि अभी पेट्रोल, डीजलको जीएसटीमें लानेका कोइ निर्णय नहीं हुआ है। ऐसे निर्णय जीएसटी काउंसिल ही ले सकती है । ऐसेमें समझा जा सकता है कि जनताको तेल और गैसके बढे मूल्योंसे लाभ नहीं मिलने वाला। शासनने अपने स्वामित्व वाले उद्योगकी वर्ष २०१७-१८ के मध्य हुए लाभका जो ब्यौरा बताया है, वह सुनकर आप चौंक पडेंगे ! विशेष बात है कि शासनके पास निजी तेल उद्योगके व्यापार और लाभका कोई आंकड़ा ही नहीं है । एक लिखित प्रश्नके उत्तरमें स्वयं संसदमें शासनने यह स्वीकार किया है । समझा जा सकता है कि जब शासकीय उद्योग इतना लाभ कर रहा है तो फिर निजीने भी कितना लाभ अर्जित किया होगा । शासनने सोमवारको एक प्रश्नपर लिखित उत्तरमें बताया कि पेट्रोलियम एवं गैस मन्त्रालय निजी क्षेत्रकी पेट्रोलियम उद्योगके लाभका ब्यौरा नहीं रखता है ।

तृणमूल सांसद प्रो. सौगत रायने लोकसभामें तीन लिखित प्रश्न पूछे थे । उन्होंने पिगतछले वित्तीय वर्षमें शासकीय स्वामित्व वाली पेट्रोलियम कम्पनियोंके व्यापार और लाभका जहां ब्यौरा मांगा था, वहीं उस अवधिके मध्य निजी पेट्रोल उद्योगके लाभका तुलनात्मक गणित भी पूछा था । शासनसे यह भी बतानेको कहा था कि शासकीय उद्योगोंने अधिक लाभ अर्जित या फिर निजीने । शासकीय पेट्रोलियम उद्योगने लाभका एक निश्चित भाग सीएसआर मदमें सामाजिक कार्योंके लिए व्यय किया या नहीं ?, इस पर भी उन्होंने प्रश्न किया था । इस पर पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधानने वर्ष २०१७-१८ के मध्य पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मन्त्रालयके अधीन आने वाली तेल और गैस उद्योगोंके व्यापार, लाभ और सामाजिक उत्तरदायित्वमें दिए व्ययका ब्यौरा उपलब्ध कराया है, जिसके अनुसार कुल दस शासकीय उद्योगोंने केवल एक वर्षमें जहां १२.९२ लाख कोट्यावधिसे अधिकका व्यापार नहीं किया, वहीं ६८५९६ रुपयेका लाभ कमाया ।

‘इण्डियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ने वर्ष २०१७-१८ में सबसे अधिक ५०९८४२.०० कोटि रुपयेका व्यापार किया, वहीं लाभ २१३४६ कोटि रुपये हुआ । दूसरे स्थानपर ‘भारत पेटोलियम’ रहा । इसने २७७१६२.२३ कोटाका व्यापार और ७९१९.३४ लाख रुपयेका लाभ अर्जित किया । । तीसरे स्थानपर रहे ‘हिन्दुस्तान पेट्रोलियम ने २४४०८५.१२ कोटि रुपयेका कुल व्यापार किया, वहीं लाभ ६३४७.०७ करोड रुपये हुआ । तेल और प्राकृतिक गैस निगमने ८५००४ कोटिका व्यापार और १९९४५ कोटिका लाभ कमाया । कुल दस शासकीय स्वामित्व वाले उद्योगमें व्यापारके प्रकरणमें सबसे नीचे ‘इंजीनियर्स इण्डिया लिमिटेड कम्पनी’ रही, जिसने १७८७.५८ कोटिका व्यापार और ३७७.८७ कोटि रुपयेका लाभ अर्जित किया ।

शासकीय स्वामित्व वाली सभी दस तेल और गैस उद्योगोंने सामाजिक कार्योंमें १४५८.02 कोटि रुपये व्यय किए । ‘कम्पनीज एक्ट २०१३’ के अनुसार सभी प्रकारके उद्योगोंको कुल लाभका ‘कम से कम’ दो प्रतिशत सामाजिक कार्योंके लिए व्यय करना पडता है। जिसे ‘कारपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (सीएसआर) फण्ड’ कहते हैं । इस प्रकारसे इण्डियन ऑयलने सर्वाधिक ३३१.०५, भारत पेट्रोलियम ने १७६, हिन्दुस्तान पेट्रोलियमने १५६.८७ करोड रुपये सामाजिक कार्योंके लिए व्यय किए ।

स्रोत : जनसत्ता



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