शास्त्र वचन


यः कश्चिदप्यसम्बद्धो मित्रभावेन वर्तते ।
स एव बन्धुस्तन्मित्रं सा गतिस्तत् परायणम् ॥
अर्थ : विदुर, धृतराष्ट्रसे कहते हैं : पहलेसे कोई सम्बन्ध न होनेपर भी जो मित्रताका व्यवहार करे, वही बन्धु, वही मित्र, वही सहारा और वही आश्रय है ।



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