शास्त्र वचन


स हि भवति दरिद्रो यस्य तॄष्णा विशाला ।
मनसि च  परितुष्टे कोर्थवान् को  दरिद्र: ॥
अर्थ : जिसकी इच्छाएं विशाल हैं, वह ही दरिद्र है । मनके सन्तुष्ट हो जानेपर, कौन धनी है और कौन निर्धन ?


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