शास्त्र वचन


सहृदयं साम्मनस्यमविद्वेषं कृणोमि व: ।
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ।
अर्थ : हे मनुष्यो ! तुम्हें मैं, सौहार्द, सामंजस्य तथा अविद्वेषका उपदेश करता हूं । तुम एक-दूसरेको वैसे ही प्रेम करो, जैसे नवजात वत्ससे गौ प्रेम करती है ।


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