शास्त्र वचन


कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः।               मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा॥                अर्थ : फूलोंके समान मनीषियोंकी दो ही गतियां होती हैं; वे या तो समस्त विश्वके सिरपर सुशोभित होते हैं या वनमें अकेले बिना किसीके जानकरीके स्वयंको विलीन कर देते हैं।



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