मनके डोर बुद्धिके हाथमें डालें


आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।

कठोपनिषत्

अर्थ : स्वयंको एक यात्री समान समझें और इस देहको एक रथ समान ।  मनके डोर बुद्धिके हाथमें डालें और बुद्धिको सारथी मानें ।



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