धर्म ही मनुष्यता प्रदान करता है !


आहारनिद्राभयमैथुनञ्च समानमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मोहि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हिनाः पशुभिस्समानाः ।।

– चाणक्य नीति
अर्थ : आहार, निंद्रा, भय और मैथुन,  ये मनुष्य और पशुमें समान होते हैं। मात्र धर्म ही मनुष्यको भिन्न अभिज्ञान(पहचान) देता है; अतः धर्म-विमुख जीव पशु समान है।



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