शास्त्र वचन


तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः ।

सर्वमार्यकृतं चौक्ष्यं वालसंस्पर्शनानि च ॥

अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : तीर्थोंमें श्रेष्ठ तीर्थ विशुद्ध हृदय है, पवित्र वस्तुओंमें अतिपवित्र भी विशुद्ध हृदय ही है । शिष्ट पुरुष जिसे आचरणमें लाते हैं, वह आचरण सर्वश्रेष्ठ है । चंवर आदिमें लगे हुए गायकी पूंछके बालोंका स्पर्श भी शिष्टाचारानुमोदित होनेके कारण शुद्ध है ।

असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि ।

उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठितम् ॥

अर्थ : धृतराष्ट्रसे विदुर कहते हैं : अत्यन्त कुशल विद्वानोंके द्वारा भी उपदेश किया हुआ ज्ञान व्यर्थ ही है, यदि उससे कर्तव्यका ज्ञान न हुआ अथवा ज्ञान होनेपर भी उसका अनुष्ठान न हुआ ।



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