रामचरितमानसमें गोस्वामी तुलसी दासजीने दुर्जन प्रवृत्तिके व्यक्तिको भी नमन किया है; परंतु विशेष बात यह है कि उन्होने दुर्जनोंकी विशेषता बताई है , प्रत्येक व्यक्तिने अतर्मुख होकर इसे पढना चाहिए और अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि कहीं अंशमात्र भी हमारे अंदर वैसी आसुरी प्रवृत्ति तो नहीं है।
चौपाई :
* बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥1॥
अर्थ :-अब मैं सच्चे भावसे दुष्टोंको प्रणाम करता हूं, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करनेवालेके भी प्रतिकूल आचरण करते हैं । दूसरोंके हितकी हानि ही जिनकी दृष्टिमें लाभ है, जिनको दूसरोंके उजडनेसे हर्ष और बसनेमें विषाद होता है ॥1॥
* हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥2॥
अर्थ :-जो हरि और हरके यश रूपी पूर्णिमाके चन्द्रमाके लिए राहुके समान हैं (अर्थात जहां कहीं भगवान विष्णु या शंकरके यशका वर्णन होता है, उसीमें वे बाधा देते हैं) और दूसरोंकी बुराई करनेमें सहस्रबाहुके समान वीर हैं। जो दूसरोंके दोषोंको सहस्र नेत्रोंसे देखते हैं और दूसरोंके हित रूपी घीके लिए जिनका मन मक्खीके समान है (अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घीमें गिरकर उसे व्यर्थ कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरोंके बने-बनाए कार्यको अपनी हानि करके भी बिगाड देते हैं) ॥2॥
*तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥3॥
अर्थ :-जो तेजमें (दूसरोंको जलानेवाले ताप) अग्नि और क्रोधमें यमराजके समान हैं, पाप और अवगुण रूपी धनमें कुबेरके समान धनी हैं, जिनकी प्रगति सभीके हितका नाश करनेके लिए केतुके (पुच्छल तारे) समान है और जिनके कुम्भकर्ण समान सोते रहनेमें ही भलाई है ॥3॥
* पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदऊं खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा ॥4॥
भावार्थ:-जैसे ओले खेतीका नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरोंका काम बिगाडनेके लिए अपना शरीर तक छोड देते हैं। मैं दुष्टोंको (सहस्र मुखवाले) शेषजीके समान समझकर प्रणाम करता हूं, जो पराए दोषोंका सहस्र मुखोंसे बडे रोषके साथ वर्णन करते हैं ॥4॥
* पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना ॥
बहुरि सक्र सम बिनवउं तेही। संतत सुरानीक हित जेही ॥5॥
अर्थ :-पुनः उनको राजा पृथुके (जिन्होंने भगवानका यश सुननेके लिए दस सहस्र कान मांगे थे) समान जानकर प्रणाम करता हूं, जो दस सहस्र कानोंसे दूसरोंके पापोंको सुनते हैं। तत्पश्चात् इन्द्रके समान मानकर उनकी विनय करता हूं, जिनको सुरा (मदिरा) हितकारी लगती है (इन्द्रके लिए भी सुरानीक अर्थात् देवताओंकी सेना हितकारी है) ॥5॥
* बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा ॥6॥
अर्थ :-जिनको कठोर वचन रूपी वज्र सदा प्रिय लगता है और जो सहस्र नयनसे दूसरोंके दोषोंको देखते हैं ॥6॥
दोहा :
* उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥4॥
अर्थ :-दुष्टोंकी यह रीति है कि वे उदासीन, शत्रु अथवा मित्र, किसीका भी हित सुनकर जलते हैं । यह जानकर दोनों हाथ जोडकर, यह जन प्रेमपूर्वक उनसे विनय करता है ॥4॥
चौपाई :
* मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥1॥
अर्थ :-मैंने अपनी ओरसे विनती की है; परन्तु वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे। कौओंको बडे प्रेमसे पालिए; परन्तु वे क्या कभी मांसके त्यागी हो सकते हैं ? ॥1॥
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