यौवन कालमें बुद्धि करती है व्यथित


सुनिर्मलाsपि विस्तीर्णा पावन्यपि हि यौवने ।
मतिः कलुषतामेति प्रावृषीव तरङ्गिणी ।। – श्रीवशिष्ठ दर्शनं ( १:२०: १८)  
अर्थ : यद्यपि बुद्धि निर्मल, व्यापक और पावन होती है तथापि वह यौवन कालमें एक बरसाती नदी समान
व्यथित करती है ।



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