चित्ते प्रसन्ने भुवनं प्रसन्नं चित्ते विषण्णे भुवनं विषण्णम् ।
अतोऽभिलाषो यदि ते सुखे स्यात् चित्तप्रसादे प्रथमं यतस्व ॥
अर्थ : यदि चित्त (मन) प्रसन्न हो तो सम्पूर्ण विश्व अच्छा लगता है और यदि चित्त अशांत हो तो सम्पूर्ण जगतमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता; अतः जिन्हें सुख चाहिए उन्होंने सर्वप्रथम अपने चित्तकी प्रसन्नता के उपाय करने चाहिए ( और वह साधनासे ही साध्य हो सकता है ) |
Leave a Reply