शास्त्रज्ञ खरे ज्ञानी हो यह आवश्यक नहीं !


यथा खर: चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य।
एवं हि शास्त्राणि बहुनि अधीत्य अर्थेषु मूढा: खरवद् वहन्ति।।

अर्थ : जिस प्रकार गधेको चन्दनकी लकडियोंको ढोते समय उसे भान नहीं होता कि अति मूल्यवान एवं सुगंधित लकडी उसके पीठपर है, उसी प्रकार शास्त्रज्ञोंको शास्त्रोंका खरा अर्थ समझमें नहीं आता वे भी खरके समान शास्त्रके ज्ञानका अहं रूपी बोझ उठाए फिरते हैं।



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