कूटनीति


नात्मच्छिद्रं रिपुर्विद्याद्विद्याच्छिद्रं परस्य तु ।
गूहेत्कूर्म इवाङ्गनि रक्षेद्विवरमात्मनः ॥ – महाभारत १२.१४०.२४                               
अर्थ : स्वयंके मर्मस्थान शत्रुको नहीं समझमें आने चाहिए; परंतु शत्रुके मर्मस्थान ढूंढ कर निकालना चाहिए ।  कछुआ जिस प्रकार अपने सर्व अवयय अपने शरीरमें छुपाकर रखता है उसी प्रकार राज्यके (राष्ट्र) सभी अंग गुप्त रखने चाहिए और अपने छिद्र (मर्मस्थान) संभालकर रखने चाहिए ।



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