समान प्रकृतिवालोंसे मित्रताका सहज होना


मॄगा: मॄगै: संगमुपव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरंगास्तुरंगै:।
मूर्खाश्च मूर्खै: सुधय: सुधीभि: समानशीलव्यसनेषु सख्यं।।
अर्थ : मृग, मृगके साथ रहते हैं, गौ, गौके साथ रहती हैं और घोडा, घोडेके साथ ! मूर्खको मूर्खोंकी संगत मिल जाती है और विद्वान, विद्वानके साथ मित्रता करते हैं, समान स्वभाव और समान व्यसनवालोंमें स्वतः ही मित्रता हो जाती है |



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